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आज़ादी-ए-हिंद का उद्देश्य और हमारा हाल

आज़ादी-ए-हिंद का उद्देश्य और हमारा हाल

मौलाना आफताब अज़हर सिद्दीक़ी

      जंगे आज़ादी की सालों की मेहनत और लाखों जानों की क़ुरबानी के बाद हमारा देश भारत ज़ालिम अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद हुआ, हम भारतीय हर साल पंद्रह अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं, स्वतंत्रता के बाद छब्बीस जनवरी को भारत का लोकतांत्रिक निज़ाम बना और भारत की आज़ादी को ख़ुदा का आशीर्वाद समझकर हर इंसान को उसका सही हक़ दिए जाने के नियम बनाए गए,
अब हर भारतीय को आज़ादी की सांस लेना नसीब हो चुका था,
अब हर भारतीय के लिए बराबर के अधिकार थे,
अब काले गोरे का भेद खत्म हो चुका था,
अब जाति की बातें कम ही रह गई थीं,
और यह सब इसलिए था कि सभी भारतियों ने देश की आज़ादी के लिए अपनी जान तक की बाज़ी लगा दी थी,
कई दशकों तक अपने खून को पसीने की तरह बहाने के बाद-
हजारों सितम सहने के बाद-
लाखों लोगों के बलिदान के बाद-
इस देश की कश्ती ने आजादी के तट पर कदम रखा था।

इसी आज़ादी की सदा बुलंद करने के बदले में हजारों उलेमा की गर्दनों को काट कर पेड़ पर लटकाया गया था।

इसी स्वतंत्रता को देखने के लिए हजारों माओँ ने अपने लाडलों की जुदाई सहन की थी।

इसी स्वतंत्रता की खातिर हजारों जवान अपने सिर पर कफन बांधकर निकल पड़े थे और अपने जीवन को भारत की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया था।

इसी स्वतंत्रता के सपने को साकार करने के लिए अनगिनत सुहागनों ने अपने सुहाग को उजड़ता हुआ देखा था।

इसी स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए लाखों बच्चों को यतीमी का ग़म उठाना पड़ा था।

जब अंग्रेज के खिलाफ बग़ावत का झंडा बुलंद हुआ और अंग्रेजों ने अपने विद्रोहियों को तड़पा तड़पा कर मौत के घाट उतारने का अभियान शुरू किया तो हमारे उलेमा जान हथेली पर रखकर सबसे पहले मैदाने कारज़ारे में आए और हजारों हज़ार ने आज़ादी की ख़ातिर जामे शहादत नोश किया।

उस समय भारत के सभी धर्म अंग्रेज़ के खिलाफ एकजुट हो गए थे।
हिंदू, सिख और मुसलमानों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ तन मन धन की बाज़ी लगा दी थी।

इस देश की आज़ादी में जहां हिंदू भाइयों की अनगिनत जानें कुर्बान हुईं, बेशुमार सिखों को फांसी पर लटकाया गया वहीं सबसे ज़ियादा उलेमाए इस्लाम ने अपनी गर्दनें कटाकर शहादत का दर्जा हासिल किया
हां! हां!
उलेमाए इस्लाम की क़ुरबानी अगर इस देश के काम न आती तो शायद यह देश कभी ग़ुलामी की ज़ंजीर से नहीं निकल पाता।
खुद अंग्रेजों ने हमारे उलेमा की शहादत को नोट किया है अंग्रेज इतिहासकार मिस्टर टामसन की लिखी हुई तारीखी दास्तान पढ़ो तो तुम्हें मालूम होगा कि हमारे उलेमा की कितनी क़ुर्बानियाँ हैं।

मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, शाह वलीयुल्लाह मुहद्दिस देहलवी, फतह मोहम्मद अली टीपू सुल्तान, मौलाना कासिम नानोतवी मौलाना रशीद अहमद गंगोही, हाजी इमदादुल्लह मुहाजिर मक्की, नवाब सिराजुद्दौला, सैय्यद अहमद शहीद, अल्लामा अबुलमहासिन वह मुजाहिदीने आज़ादी हैं कि दुनिया चाह कर भी भारत के इतिहास से उनके नाम को नहीं मिटा सकती, उनके अलावा कितने ही उलेमा ने आजादि-ए-हिंद के लिए अपनी जानों की बाज़ी लगाई तब जाकर यह देश आज़ाद हुआ और यहां के रहने वाले इंसानों को चैन की सांस लेना और राहत की ज़िंदगी बसर करना मयस्सर हुआ।

लेकिन आज हम लोग इस आज़ादी की क़दर व क़ीमत भूल गए, आज हम स्वतंत्रता और लोकतंत्र की किताब को अपने पैरों तले रौंद रहे हैं –
आपसी एकता को खत्म करके-
मानवता की ऊंची इमारत पर जाति का बुलडोजर चलाकर-
काले गोरे में भेदभाव करके-
धर्म के नाम पर झगड़े करके-
राजनीति के नाम पर गुंडागर्दी करके-
एक आम आदमी का जीना दुश्वार करके-
हम आज क्या कर रहे हैं।?
इन सब बातों से जहां हम स्वतंत्रता के सच्चे सेनाओं की मेहनतों पर आज पानी फेर रहे हैं वहीं आने वाले समय में देश के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।
जरा सोचिए! जिस चमनिस्तान को हमारे बड़ों ने मिलजुल कर अपने खून से सींचा था ताकि हमें बहारों के ख़ुशगवार मौसम में जीने का मौका मिल सके आज हम खुद ही उस चमन को उजाड़ने पर तुले हुए हैं?
आखिर क्यों?
क्या स्वतंत्रता का यही उद्देश्य था?
क्या जमहूरयत के कार्यान्वयन की यही वजह थी?
आखिर किस लिए हम ने अंग्रेजों के नापाक चंगुल से देश को छुड़ाया था?
जरा अक़्ल का दीपक रोशन कीजिए और सोचिए कि हम अपनी आज़ादी और लोकतंत्र की रक्षा चाहते हैं या बर्बादी?
अगर देश की तरक्क़ी चाहते हैं तो इसके लिए हमें क्या करना चाहिए और हम क्या कर रहे हैं।?

हर तबक़ा विचार करे कि देश के प्रति वह क्या कर रहा है?
आज सभी राजनीतिक दलों और स्वार्थी नेताओं ने स्वतंत्र भारत की छवि को भद्दा बना कर रख दिया है, हर नेता अपना और अपनी पार्टी का लाभ चाहता है, देश और जनता के लिए कोई कुछ सोचने को तैयार नहीं बल्कि देश में अक्सर तबाही इन्ही राजनीतिक सिंहासन पर बैठने वालों की लापरवाई का परिणाम होता है।
आज भारत में कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी नहीं जो राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने के बावजूद देश का विकास चाहती हो
जब तक यह राजनीतिक पार्टियां पूर्वाग्रह, आत्म निन्दा, अन्याय, अधिकारों का हनन, भ्रष्टाचार और असहिष्णुता की राह छोड़कर एकजुटता, इंसाफ, सत्य और इंसान दोस्ती के रास्ते पर नहीं आएंगी तब तक देश का वातावरण आक्रामक रहेगा और यहां का हर निवासी परेशान रहेगा।
माना कि देश का विकास जनता की प्रत्यक्ष सोच पर आधारित है, लेकिन जबकि सरकार खुद सही सोचने और विकास की राह पर चलने में असमर्थ हो तो जनता किस ओर चलेगी? सरकार में अगर अच्छे लोग हों और नेता सही सोच रखने वाले हों तो इसका असर निश्चित रूप से जनता पर पड़ता है, सरकार अगर समानता की बात करे तो हर तबका सरकार की बात मानने के लिए तैयार होगा, लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल विपरीत है सरकार समर्थित संगठनें या नेताओं के धर्म व विचार वाले लोग कितना ही भ्रष्टाचार करें, कितनी ही लूट मचाएँ, खुलेआम बदमाशी करें, सरे आम दंगा फैलाएँ, सरकारी विभागों में खुलकर धांधली करें, रिश्वत और जालसाजी का बाजार गर्म करें ; लेकिन शासकों की ओर से कोई रद्दे अमल नहीं होता, अदालत और न्याय का यह हाल है कि गरीब आदमी पीड़ित होकर भी दोषी करार दे दिया जाए और अमीर इनसान दोषी होकर भी बाइज़्ज़त बरी कर दिया जाए,
ख़ुदा जाने इस देश का मुक़द्दर कब चमकेगा !!

संपर्क नंबर: 9568136926