अररिया में पत्रकारिता का बुलन्द इक़बाल, आरिफ़ इक़बाल

 

सैफ अली खान (स्वतंत्र पत्रकार व समाज सेवी)

पेड औऱ फेंक न्यूज़ के इस दौर में दम तोड़ती पत्रकारिता में सूचनाएं लगभग समाप्त चुकी है,पत्रकार को पत्रकार बने रहना आज बड़ी चुनौती है,वर्तमान में पत्रकारिता की धारा जिस ओर मुड़ी हुई है उस धारा के विपरीत चलना एक पत्रकार के रूप में अब आसान नही रहा, देश से लेकर प्रदेश की पत्रकारिता देख लें, कम व बेश यही हाल देखने को मिलेगा, मगर मैं यहाँ अपने अररिया जिला के पत्रकार और पत्रकारिता शैली पर बात करना चाहता हूं, हमारे अररिया ज़िले में ज्यादातर पत्रकारों (सब नही)से चंद रुपये के एवज आप उनसे जो चाहे लिखवा या प्रसारित करवा सकते है, और यह एक कड़वा सच है,इक होड़ बनी हुई है किसने कितनी दलाली कर कितना जेब भरा? पेड न्यूज़ की वजह से ज़रूरी सूचनाएं हम दर्शकों तक पहुँचना बंद हो गईं थी।
इसी दौरान ईटीवी भारत उर्दू का माइक लिए दरमयान कद के नौजवान पत्रकार, दरभंगा से हमारे जिलें में चल कर आते हैं और कुछ ही दिन में अपने धमाकेदार, जानदार,शानदार और ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग कर हमारे बीच छा जाते हैं, जिनके पत्रकारिता का जादू हर वर्ग और हर क्षेत्र के बुद्धिजीवियों के सर् चढ़ कर बोलने लगता है, नाम है आरिफ़ इक़बाल।
यह संयोग रहा होगा कि मेरे अभिभावक तुल्य शाहजहां शाद शाहब का फोन मेरे नंबर पर आया कि आरिफ़ इक़बाल नाम के एक रिपोर्टर हैं, वो अररिया ईटीवी भारत उर्दू के लिए रिपोटिंग करेंगें,उन्हें अररिया के महत्वपूर्ण जगहों से रूबरू कराने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है, मैंने कहा ठीक है, मैं इस सोच में था उर्दू रिपोर्टर है तो अधेड़ उम्र के होंगे, मैं फारबिसगंज बस स्टोप पर उनका इंताजर करने लगा, गाड़ी आकर रुकी, एक नौजवान मेरी ओर बढ़ा फिर परिचय हुआ। फिर मैं आरिफ इक़बाल साहब को फारबिसगंज से मोटरसाइकिल पर बैठा कर अररिया के लिए निकले,रास्ते मे अररिया जिला के बारे में मुख्य मुख्य बातों से भी अवगत कराता रहा, बीच बीच मे आने वाले चौक चोराहों और गांव भी दिखाता रहा, पर इस सफर में रह रह कर मेरे मन में ये ख्याल चल रहा था, ये ख़ामोश मिजाज़ और नॉर्मल सा दिखने वाले, जिनके बाल बिखरे हुए हैं, पहनावा में कोई खास बात नही है और उर्दू के पत्रकार क्या रिपोटिंग करेंगें? ये भी उस भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे जैसे दूसरे पत्रकार, पत्रकारिता के नाम पर बनें हुए हैं। लेकिन मैं गलत था, मेरे अंदाज़े को इन्होंने कुछ दिनों में ही चकनाचूर कर दिया और बताया हर देखने वालों को उसके ज़ाहिरी आमाल से मत पहचानो, सादा दिखने वाला इंसान अपने अंदर कई गुण छुपाए होता है और चमकने वाला हर चीज़ सोना नही होता। आरिफ इक़बाल भाई ने बस कुछ दिनों में अपने पत्रकारिता के जो जौहर दिखाएं तो बस मैं इनकी सलाहियत का कायल हो गया। और फिर अपने उस पहली मुलाकात को याद करने लगा और उस मुलाक़ात से एक सीख भी मिली।
आरिफ इकबाल भाई के आने से पहले हमें पत्रकारिता बिल्कुल सपाट और सादा लगता था, मगर इन्होंने ने अररिया में पत्रकारिता के ऐसे ऐसे वेराइटी और रंग दिखाएं जिस हम लोग अंजान थे, इनकी पत्रकारिता को देख अच्छे अच्छे पत्रकारों के कान खड़े हो गए, इनकी स्पेशल स्टोरी में दिखाए जाने वाले एक एक चीज़ रोमांचित और उत्सुकता पैदा करता है, किसी भी स्टोरी के लिए दो चीज़ बहुत अहम होता है, स्क्रिप्ट और विजुवल। आरिफ भाई के स्टोरी की यही खास बात है, इनकी स्क्रिप्ट ज़बरदस्त और अलग अंदाज की होती है, उर्दू हिंदी के बेहतरीन शब्द यूज करते हैं जिस से सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो उठता है, समस्याओं को किस अंदाज़ में पेश करना है, उन समस्याओं से जुड़ी कौन कौन शब्द अफेक्टिव हो सकते हैं, ये सब विशेषता सिर्फ आरिफ इक़बाल भी की स्क्रिप्ट में देखा, स्टोरी में वीडयो किस एंगल से और कितना दिखाना है, किस तरह के शार्ट स्टोरी को रिलेट करेगा, कौन सा वीडयो मास अपील करेगा ये सब इनकी स्टोरी में ही देखने को मिलती है। इनकी स्टोरी की सब से खास बात लास्ट ने P To C यानी पीस टू कैमरा है, जिस में रिपोर्ट उस स्टोरी का केन्क्यूलेज़न बताता है। इतने कम शब्दों में आरिफ भाई बेहतरीन अंदाज़ में अपनी स्टोरी खत्म करते हैं जो पूरी स्टोरी का एक निचोड़ होता है। ये सब गतिविधि आरिफ भाई के आने से पहले पत्रकारों में नही था, मगर अब देख रहा हूँ कुछ पत्रकार ये सब करने लगे हैं।
आरिफ इक़बाल भाई जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसी प्रतिष्ठित संस्था में पत्रकारिता के छात्र रहे हैं, जामिया मिल्लिया इस्लामिया पत्रकारिता के पढ़ाई के लिए विश्व भर में जाना जाता है और एशिया में नम्बर वन के रैंकिंग पर है। यहाँ उन्होंने बड़े बड़े पत्रकारों से पत्रकारिता को पढ़ा है, इसकी बारीकी को समझा है, पत्रकारिता के टर्म और यूज़ होने वाले टेक्नोलॉजी को देखा है, जिसका इस्तेमाल इन्हों ने अपनी पत्रकारिता में भरपूर किया है। मुझे नही लगता अररिया में कोई पत्रकार पत्रकारिता के इतने एथिक्स और इसके भाव को समझता हो। यही सारे गुण आरिफ इक़बाल भाई को दूसरे पत्रकारों से अलग करता है।
आरिफ इक़बाल भाई के द्वारा की गई कई स्टोरी मेरा फेवरेट रहा है, मगर मेरी नज़र उनकी कुलहैया जाति और इसके सामाजिक स्थिति पर बनाई रिपोर्ट बहुत खास है, यही उनकी पहली स्टोरी थी जिसे देख मैं सरप्राइज हुआ था, क्योंकि पिछले कुछ बीते वर्षों में ऐसी बुनियादी समस्याओं पर खबरें देखने या पढ़ने को नही मिल रही थी,उसके बाद लगातार अररिया के बुनियादी समस्याओं को चाहे,बाढ़,सूखा,स्वास्थ्य व्यवस्था,शिक्षा,सड़क ,बिजली,पुल-पुल्लियों सामाजिक भेदभाव-पिछड़ापन,पलायन को लेकर एक के बाद एक बेहद मार्मिक अंदाज़ में स्टोरी पेश करते रहें।
आरिफ इक़बाल भाई की पत्रकारिता से जो जुनून है उसे आप इस सिरे से माप सकते है कि करोना के महामारी में भी वो लगातार लोगों के बीच उनकी समस्याओं को सबों के सामने पहुंचा रहे थे, नतीज़ा यह रहा कि जिले में ये पहले पत्रकार थे जो करोना से संक्रमित हुए, फारबिसगंज कोविड सेंटर में 10 दिनों तक भर्ती रहे, मगर आश्चर्य तब हुआ जब इन्होंने कोरोना ग्रसित होने के बाद भी पत्रकारिता धर्म निभाते हुए सेंटर के अंदर की कुव्यवस्था को जिलाप्रशासन और जनता के बीच लाएं। इनकी रिपोर्ट बिहार सरकार के उच्च अधिकारी तक भी पहुँची और उस पर कार्रवाई भी हुई। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ लोग आरिफ़ इक़बाल के लिए शुरू के दिनों कहा करते थे कि नए मौलवी नमाज़ ज्यादा पढ़ते है, सामाजिक पत्रकारिता का भूत कुछ दिनों में ही उतर जायेगा, फिर वही नेताओं के पीछे दिखेंगे अन्य पत्रकारों की तरह, पर आज दो साल हो गए, अररिया में आरिफ इक़बाल भाई ने पत्रकारिता में एक लंबी लकीर खिंच दी,वे भीड़ में शामिल नही हुए बल्कि भीड़ को अपने जैसा बनाने में भी सफ़ल रहे। आज अररिया में पत्रकारिता के इक़बाल को आरिफ़ इकबाल भाई ने बुलंद कर दिया है। मैं बंजारा समुदाय से हूँ और अररिया में 25 सालों से रहता आ रहा हूं। इतने दिनों में पहली बार किसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हम बंजारों की सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन की रिपोटिंग आरिफ़ इक़बाल भाई ने की,पत्रकार को समाज का चिकित्सक माना जाता है और मैं यह डंके की चोट पर कह सकता हूँ आरिफ इक़बाल भाई ने आज के दौर के दलाली पत्रकारिता का इलाज़ कर दिया है। मेरा अटूट विश्वास है कि अब,जब कभी भी खोजी पत्रकारिता की बात हमारे ज़िले में की जाएगी तो आरिफ़ इक़बाल भाई का नाम लिया जायेगा। आखिर में अररिया में दो साल पूरे होने पर पत्रकारिता के सचिन तेंदुलकर आरिफ इक़बाल भाई को ढ़ेरों बधाई व शुभकामनाएं।