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जमीअत उलेमा ए हिंद द्वारा मुस्लिम पर्सनल लॉ में ट्रेनिंग कोर्स लांच , इस ऐतिहासिक क्षण की गवाह बनीं कई महत्वपूर्ण हस्तियों

जमीअत उलेमा ए हिंद द्वारा मुस्लिम पर्सनल लॉ में ट्रेनिंग कोर्स लांच ,            इस ऐतिहासिक क्षण की गवाह बनीं कई महत्वपूर्ण हस्तियों

नई दिल्ली .4 सितम्बर
आज यहां जमीअत ए उलेमा हिन्द मुख्यालय के मदनी हॉल में जस्टिस ए एम अहमदी पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के हाथों जमीअत लॉ इंस्टीट्यूट की ओर से तैयार किया गया मुस्लिम पर्सनल लॉ ट्रेनिंग कोर्स का उद्घाटन हुआ, जिसमें लगभग ४०० एडवोकेट्स और उलमा ने भागीदारी की। इस बैठक की अध्यक्षता, मौलाना कारी मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी अध्यक्ष जमीअत उलेमा हिंद ने की । इस अवसर पर जस्टिस अहमदी, मौलाना कारी मोहम्मद उस्मान,मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी, मौलाना सैयद मोहम्मद शाहिद, जफरयाब जिलानी, मुफ्ती मोहम्मद सलमान, अख्तरुल वासय, शकील अहमद सैयद, कमाल फ़ारूक़ी सहित कई महत्वपूर्ण हस्तियों ने संबोधित किया , इस अवसर पर मीडियाप्रतिनिधि से बातचीत में मौलाना महमूद मदनी महासचिव जमीअत उलेमा ए हिंद ने इस कोर्स की जरूरत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसमें शरीयत कानून (निकाह , तलाक, विरासत, विलायत, वसीयत आदि) से संबंधित जानकारी शामिल है, जो वर्तमान परिस्थितियों में वकीलों के लिए तैयार किया गया है, उन्होंने कहा कि हालांकि बेहतर संसाधनों की कमी है लेकिन समान सोच रखने वाले कानूनी क्षेत्र के सदस्यों और लीगल दोस्त सज्जनों की मदद से सफल होने की उम्मीद है।

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जस्टिस अहमदी ने प्रोग्राम को संबोधित करते हुए जमीअत के इस प्रयास की प्रशंसा की और कहा कि हमें उत्तेजना के बजाय धैर्य और समझदारी से स्थिति का सामना करना चाहए, उन्होंने कहा कि हर कम्युनिटी को कभी न कभी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, अब उसे यह सीखना चाहिए कि इन हालात के पैदा होने के कारण क्या हैं, अगर उसके अंदर कोई त्रुटि है तो सुधार करना चाहिए। यदि यह समस्या इस के खिलाफ चाबुक के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, तो उत्तेजना के बजाय गंभीर कदम की ज़रूरत है , क्योंकि विरोधियों का मकसद ही उत्तेजित करना और सार्वजनिक मजाक बनाना है, इसलिए उनके उद्देश्य को विफल करने के लिए होशमंदी और बुद्धि का मार्ग अपनाने की जरूरत है, उन्हों ने धारा 44 के संबंध में कहा कि इसके तहत कॉमन सिविल लॉ की बात की जाती है, इस पर ये सवाल उठाना चाहिए कि पहले कोई मसौदा पेश किया जाए, फिर बहस के बीच उसकी खूबियों और खामियों पर चर्चा होगी, यह सच है के ये सिविल कोड मुसलमानों से ज्यादा दूसरों के लिए सिरदर्द बन जाएगा, इसलिए हमें इस पर ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है।

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जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में मुस्लिम पर्सनल लॉ के बारे में सार्वजनिक गलतफहमी का निवारण और शरीयत इस्लामी के दृष्टिकोण को मजबूती से पेश करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जमीअत उलेमा ए हिंद की हमेशा कोशिश रही है कि कानूनी मामलों में विरोध प्रदर्शन से बचते हुए न्यायिक और उसके सहयोगी तरीके अपनाए जाएं।
दारुल उलूम देवबंद के प्रमुख मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंदर 14 / दफ़ात आते हैं, उनमें विवाह, तलाक, इद्दत, हज़ानत, वसीयत आदि हैं , लेकिन आजकल केवल तलाक को केंद्र बनाकर मीडिया परीक्षण किया जा रहा है, इस संबंध में अज्ञानता और व्यवस्था से नावाकफयत मूल कारण है। मौलाना नोमानी ने इस संवेदनशील बात की ओर ध्यान दिलाया कि तलाक के संबंध में वकीलों सज्जनों के पास जो प्रारूप है, इसमें केवल तीन तलाक का उल्लेख है. ऐसा लगता है कि केवल तीन तलाक से ही तलाक होती है, पहले प्रारूप को बदलने की जरूरत है, तलाक तो एक देने से भी पड़ जाती हे. उनके अलावा इस्लामिक फ़िक़ह अकादमी के महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी, मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के अमीन आम मौलाना सैयद शाहिद, मुफ्ती मोहम्मद सलमान मंसूरपुरी शिक्षक हदीस मदरसा शाही मुरादाबाद, प्रोफेसर मोहम्मद अफजल वाणी, जफरयाब जिलानी, एडवोकेट जनरल गवर्नमेंट ऑफ उत्तर प्रदेश, प्रोफेसर अख्तरुल वासय, कुलपति मौलाना आजाद विश्वविद्यालय जोधपुर, कमाल फ़ारूक़ी पूर्व चेयरमेन दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग, एडवोकेट आईएम खान आदि ने भी संबोधित किया।
अनोउंसर्स के कर्तव्यों का पालन करते हुए एडवोकेट मौलाना नियाज़ अहमद फारुकी सदस्य कार्यकारिणी जमीअत उलेमा हिंद ने अपने उद्घाटन भाषण में स्वतंत्रता से पहले शरीयत अनुप्रयोग अधिनियम सहित मुस्लिम पर्सनल लॉ के संरक्षण में जमीअत की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला जबकि शकील अहमद सैयद साहब ने अंत में प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया.