आज़ाद भारत में मुसलमानों के हाशिए पर आने की सबसे बड़ी वजह खूद मुस्लिम लीडर ही हैं

आज़ाद भारत में मुसलमानों के हाशिए पर आने की सबसे बड़ी वजह खूद मुस्लिम लीडर ही हैं

5

मेहदी हसन एैनी
आज़ाद भारत में मुसलमानों के हाशिए पर आने की सबसे बड़ी वजह खूद मुस्लिम लीडर ही हैं. कांग्रेस,सपा,बसपा,रालोद,और ना जाने किन किन पार्टियों में मौजूद मुस्लिम चेहरे पार्टी नीति के खिलाफ़ जाने की कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाते. साथ ही खुद इन पार्टियों में मठाधीश बन कर बैठ जाते हैं,और किसी भी नये चेहरे को पार्टी में ऊंची जगह बनाते हुए देखना पसंद नहीं करते।
देश के 15% मुसलमान और उत्तर प्रदेश के 20% मुसलमान भाजपा के डर से सपा या थोड़ा बहुत अन्य पार्टियों को वोट देते रहे हैं। आज 21 वीं सदी में जब हजारों साल से शोषित और दबा कुचला दलित समाज अपने हृदय से ब्राह्मणवाद का डर निकाल कर अपने हक के लिए ब्राह्मणवादियों के ही सामने खड़ा हो गया है उसी सदी में मात्र 300 साल पहले देश में शानदार हुकूमत करने वाला मुसलमान आज भाजपा और संघ के डर से भाजपा से भी खतरनाक समाजवादी पार्टी या अन्य को वोट देता रहा है।
आज जब समाज का हर वर्ग अपने अपने मुद्दों और अपने समाज के हित के लिए पार्टियों से सौदा करके वोट करता है वहीं मुसलमान तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के फैलाए डर के कारण वोट देता है कि हमें वोट नहीं दोगे तो भाजपा जीत जाएगी । एक दम भेड़िया आया भेड़िया आया वाली कहानी के अनुसार।
कांग्रेस , समाजवादी , बहुजन इत्यादि इत्यादि के मुसलमान विधायक या नेता अपने नेतृत्व और पार्टी लाईन के विरुद्ध जाकर कुछ नहीं करेंगे ना कभी किया है क्युँकि इनको डर है कि पार्टी नेतृत्व के सोच के विरुद्ध यदि मुसलमान मुद्दे पर बोला तो पैदल हो जाएँगे। और इन सभी पार्टी के नेतृत्व या तो खुद मुसलमानों के हक की बात करना नहीं चाहते या उनको यह डर रहता है कि कहीं मुसलमानों के हक की बात ज़ोर शोर से की तो उसका बेस वोट नाराज़ ना हो जाए। और इस की सबसे बड़ी मिसाल बसपा में नसीमुद्दीन और सपा में आज़म खान हैं,
अपनी पार्टियों के हर काले को सफैद करना, साथ ही पार्टी में अपने से आगे या अपने से बराबर किसी भी दूसरे मुस्लिम लीडर को बढ़ने ना देना इन की फितरत है।
यही वजह है कि बसपा,और सपा के बनने के बाद से आज तक दोनों ही पार्टियों में इन के अलावा कोई दूसरा मुस्लिम लीडर आगे नहीं बढ़ सका. आज़म खान जिस ब्राहाण नीति के मालिक हैं इस की ताज़ा मिसाल कल ही देखने को मिली।
मौका़ था गाजियाबाद के हज हाउस के उदघाटन का. मंच पर मुसलमानों के कई मसीहा जैसे आज़म खान साहब, नवाज़ देवबंदी साहब,नज़र आ रहे थे. लेकिन मेरी नज़र नवजवान नेता,और एम.एल.सी आशू मलिक को तलाश कर रही थी। जिन की मेहनत से हज हाउस का प्रोजेक्ट पास हुआ, और इस प्रोग्राम को कामयाब बनाने के लिए उन्होंने बड़ी मेहनत की थी, पर ये क्या मुस्लिम ब्राहाणवाद नेता की वजह से आशू ब्रदर्स को इस के सेहरे से महरूम कर दिया गया।
ये बात किसे नहीं मालूम कि आशू मलिक की वजह से ही हाशिमपुरा और मुज़फ्फर नगर दंगा पीड़ितों को मुवाअज़ा मिला था,आशू को अकसर नेता जी और भय्या जी के साथ देखा जाता है. जिस की वजह से आज़म साहब को ये डर सताने लगा है कि कहीं उनके राजनेतिक उत्तरअधिकारी अबदुल्ला आज़म की जगह आशू मलिक सपा का मुस्लिम चेहरा ना बन जायें.इस ब्राहाणवाद नीति की वजह से ही आज मुस्लिम लीडरशिप हाशिए पर है।
इसलिए अब भी मौक़ा है मुस्लिम नेताओं के पास कि वो नामलेवा सेक्यूलर,और मुस्लिम हितैषियों की चाटूकारिता छोड़ कर खूद अपने पैरों पर खड़ा होना सीखें.. डराने,धमकाने की रणनीति को छोड़ कर शिक्षा,विकास,और तरक्की की बात करें। ग़रीबी,और भष्ट्राचार के खिलाफ़ लड़ने का एलान करें। अल्पसंख्यकों की दिशा और दशा को दुरुस्त करने के लिए अपने पैरों पर उठ खड़े हों.चाहे एक गांव और एक शहर से ही क्यों ना हो।