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“हम हैं मता़ ए कूचा व बाज़ार की तरह”

“हम हैं मता़ ए कूचा व बाज़ार की तरह”

मेहदी हसन एैनी क़ासमी के क़लम से

मुज़फ्फरनगर का दर्द,दादरी का ज़ख्म,
तावड़ू की पीड़ा,600 दंगों की कड़वी यादें,
सीने में ताज़ा ही थीं कि बिजनौर के पेदा
गांव में हमारे पांच भाईयों को
दरिंदगी के साथ मौत की नींद सुला दिया गया.
D.N.A रिपोर्टर आज़ान जावेद की ग्राउण्ड रिपोर्ट
बताती है कि शुक्रवार की सुबह सात बजे पेदा गाँव की एक बच्ची अपने भाई तालिब के साथ स्कूल जा रही थी। स्कूल से पहले ही जाट बिरादरी के चार पांच लड़कों ने उससे छेड़खानी की जिसका विरोध लड़की के भाई तालिब ने मौके पर ही किया। वहां तालिब की पिटाई की जाती है।
तालिब और उसकी बहन के साथ बस स्टैंड पर जाट लड़कों की बत्तमीज़ी और मारपीट की ख़बर लड़की के घरवालों को मिलती है। वे मौके पर पहुंचते हैं और हल्की नोकझोंक के बाद मामला शांत हो जाता है। थोड़ी ही देर बाद दो पुलिस वालों के सामने जाटों के दो दर्जन लोग पेदा गाँव पर हमला कर देते हैं। मर्दों को चुन चुन कर मारा जाता है। गोलियां चलाते समय वे लोग हंस रहे होते हैं। महिलाओं और बच्चियों को बलात्कार की धमकी दी जाती है। पुलिस के अनुसार तीन लोगों की मौत की अधिकारिक पुष्टि हुई है,
परंतु मौके पर पांच लोगों की मौत की बात कही जा रही है। ज्यादातर लोगों को गोली लगी है।
अभी तक हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियार पुलिस ने बरामद नहीं किए हैं। सात लोगों को पकड़ा गया है।

आगे क्या हुआ?अंधे का़नून ने दो को बर्खास्त कर दिया,
बहरी राजनीति ने एक एक मूर्तक की की़मत बीस बीस लाख और घायल की पांच लाख लगाकर मुआमले को शांत कर दिया,
दो दिन तक पुलिस कानून व्यवस्था बनाये रखेगी,
कुछ की गिरिफ़्तारियां होगी,कुछ महीनों में कोई नेता ज़मानत करवा लेगा,कातिल दनदनाते फिरेंगें,
कुछ दिनों के बाद हम भी पेदा को भूल जायेंगें,
सरताज,एहसान,अनीस की विधवाएं,और यतीम
बच्चे मर मर कर जियेंगें,और हम खुश हो जाएंगें
कि हमें इंसाफ़ मिल गया,अमन की अपील करते ना थकेंगें,
यह है हमारी जिंदा दिली,हस्सासियत,बेदारी और सहिष्णुता,
गुजरात से मुज़फ्फरनगर तक,गोपालगढ़ से दादरी तक,डींगरहेड़ी से अब पेदा तक और हमें मिला ही क्या है??
इंसाफ़ के नाम पर वर्षों चलने वाले मुक़दमे,
फिर उल्टा मज़लूमों पर ही केस,और साथ में चंद
कौड़ी दे कर,चुप कराना,
मुनव्वर राणा ने शायद इसी को अपने लफ़्ज़ों में कहा था कि
सियासत मुंह-भराई की हुनर से खूब वाकिफ़ है”
यह हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है.

सवाल ये है कि सेक्युलर हो या संघी,समाजवादी हो या नस्लवादी सरकार
उसने मुसलमानों के सामने मुआवज़ा रुपी
शाही टुकड़ा डालने के सिवा क्या ही क्या है?
एैसा कौन सा रास्ता ढ़ूंढ़ा है कि जिससे इस
प्रकार की घटनाओं को भविष्य में रोका जाये?
इस देश में याकूब को बिना साबित इलज़ामों की
वजह से फांसी हो सकती है,पर बेगुनाहोॆ का खून पीने वालों की सज़ा कुछ महीने जेल की महफूज़ मेहमानी के सिवा कुछ भी नहीं,
सरकारों ने कुछ भी नहीं किया है,बल्कि इन दंगों,मज़लूमों की आहों और मरने वालों की लाशों पर अपनी अपनी अपनी राजनीति को चमकाया है,
और एक हम मुसलमान हैं,जिन्हें फिरका़ फिरका़,
ज़ात,बिरादरी,और चाटूकारिता,के खेल से ही फुर्सत नहीं है.लेकिन हमारे लहू पर ये सब लिखा तो नहीं है,हम तो सिर्फ मुसलमान के नाम से मारे और जाने जाते हैं,
एैसे हालात में हम क्या करेंगें और हमें क्या करना चाहिये अगर वक्त रहते इस का फैसला नहीं किया तो याद रखिये निश्चित रूप से अगला नम्बर हमारा आप का ही होगा,
इसलिये रहबर और रहज़न,मसीहा और कातिल की पहचान करिये,
अपने सफों में इत्तिहाद पैदा कीजिये,
और 2017 चुनाव में खुद को मज़बूत करिए,
जब तक इस देश में मुसलमानों के पास सियासी ताक़त नहीं होगी याद रखिये हम यूँही दूसरों के रहम
व करम पर जियेंगें,70 साल तक दूसरों पर अंधा विशवास किया,अब की बार खुद अपने पैरों पर खड़े हो जाईए,
वरना यूंही हमारी की़मत लगती रहेगी,और हम बिकते रहेंगें,

वैसे भी मजरूह सुल्तानपूरी के बकौ़ल

“हम हैॆ मता़ ए कूचा व बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीददार की तरह”

09565799937