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हर ज़माने के शायर थे मजरूह सुल्तानपुरी

हर ज़माने के शायर थे मजरूह सुल्तानपुरी

 

फ़ैसल रहमानी

जन्म : 1अक्तूबर 1919
मृत्यु : 24 मई 2000

(मजरूह सुल्तानपुरी के यौम-ए-पैदाइश पर स्टार न्यूज़ टुडे की ख़ास पेशकश)

“मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए, कारवां बनता गया”

किसी शख़्स को ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने का एक तरीक़ा यह हो सकता है कि हम उसे उस तरह याद करें जैसा कि वह ख़ुद चाहता था. और अगर उसकी शख़्सियत का यह पहलू उसकी मक़बूलियत से किसी लिहाज़ में कमतर न हो तब ऐसी ख़राज-ए-अक़ीदत सबसे अच्छी कही जा सकती है.

आज मजरूह सुल्तानपुरी की यौम-ए-पैदाइश है. फ़िल्मी नग़मानिगार के तौर पर उन्होंने खूब शोहरत और नाम कमाया था. लेकिन इस मौक़े पर उन्हें ग़ज़लकार के तौर में याद करना एक बेहतर ख़राज-ए-अक़ीदत होगी क्योंकि वे ख़ुद को सबसे पहले एक ग़ज़लकार ही मानते थे.

दरअसल मजरूह सुल्तानपुरी के लिए फिल्मों में गीत लिखना कुछ ऐसा ही था जैसे कई क़लमकार नौकरियां करते हैं. यह भी मजेदार बात है कि ज़रिया-ए-म’आश की तरह अपनाने के लिए भी मजरूह को जिगर मुरादाबादी साहब ने बमुश्किल राज़ी किया था वरना वे उस वक़्त के मशहूर फ़िल्मकार कारदार साहब (एआर कारदार) को साफ़ अल्फ़ाज़ में ना कह चुके थे.

बहैसियत ख़ुद को एक शायर के तौर पर याद किए जाने की मजरूह की चाह कोई नाजायज़ भी नहीं है. अगर उनके सारे नग़मों को हम अनदेखा भी कर जाएं तो उनकी ग़ज़लें उन्हें याद रखने के लिए काफ़ी होंगी. मिसाल के लिए –

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मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

उनका यह एक ऐसा शेर है, जिसे शायरी को जानने-समझने वाले लोग भी गाहे-बगाहे इस्तेमाल करते रहते हैं और वे भी जिनका शायरी से कोई वास्ता नहीं है. एक कवि, शायर या ग़ज़लकार के लिए इससे बड़ी इज़्ज़त अफ़ज़ाई की बात भला क्या होगी कि उसके मुरीद वे लोग भी हों जो उसके बारे में कुछ नहीं जानते.

मजरूह सुल्तानपुरी के ऐसे ही कुछ और अश’आर हैं –

जफ़ा के ज़िक्र पे तुम क्यों संभल के बैठ गए?
तुम्हारी बात नहीं बात है ज़माने की
—————

ग़म-ए-हयात ने मजबूर कर दिया वरना
थी आरज़ू कि तेरे दर पे सुब्ह-ओ-शाम करें
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सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़,
जहां तलक ये सितम की सियाह रात चले
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रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या ‘मजरूह’,
हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं
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ऐसे और सैंकड़ों अश’आर यहां लिखे जा सकते हैं लेकिन, इन चंद मिसरों को पढ़कर ही समझ में आता जाता है कि उनकी शायरी में इश्क़ भी है और ज़िंदगी की उलझनों से जूझने की चाह भी.

यह उनकी शायरी का ही असर था कि तब की बहुत कमसिन माहजबीं (मीना कुमारी) बूढ़े कमाल अमरोही के मुहब्बत में मुब्तला गई थीं. अमरोही मीना कुमारी के वालिद के दोस्त थे. मीना कुमारी को शायरी का शौक़ था. इसी सिलसिले में कमाल अमरोही साहब ने उनकी शायरी ठीक करने की तजवीज़ के तहत एक शेर लिखकर दिया था. यह शेर जैसे मीना कुमारी के लिए जिंदगी का मक़सद बन गया.

कमाल अमरोही साहब की तजवीज़ वाले मिसरे कुछ यूं थे –

देख ज़िंदां से परे जोश-ए-जुनूं जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर ना देख

ये मजरूह सुल्तानपुरी का शेर था. इसने मीना कुमारी को खुले आसमान में आज़ाद उड़ने का ख़्वाब दिखाया था. यह ख़्वाब और इसके लिए हौसला दिखाने में कमाल अमरोही का अहम रोल था. सो दोनों काफ़ी क़रीब आ गए. बाद में उनके बीच तक़रार और अलगाव हुआ वह एक अलग कहानी है.

मजरूह सुल्तानपुरी से पहले ग़ज़ल की यह ज़मीन मीर, सौदा, मोमिन, ग़ालिब, और दाग़ के साथ-साथ हसरत मोहानी, अल्लामा इक़बाल, जिगर मुरादाबादी, फिराक़ गोरखपुरी का घर आंगन हुआ करती थी.

अली सरदार जाफरी के अल्फ़ाज़ में कहें तो मजरूह ग़ज़ल के इस आंगन में ‘किसी सिमटी सकुचाई दुल्हन की तरह नहीं, बल्कि एक निडर, बेबाक दूल्हे की तरह दाख़िल हुए थे.’ ज़ाहिर है यह हिम्मत और बेबाकी इतनी आसान नहीं रही होगी. इसके पीछे बहुत मेहनत-लगन, तजुर्बा और तालीम की जरूरत हुई होगी. हम अगर मजरूह सुल्तानपुरी की तमाम ग़ज़लों को देखें तो हैरानी नहीं होती कि वे इस ‘आंगन’ में किस तैयारी के साथ आए थे.

इस बात में कोई दो राय नहीं थी कि मजरूह सुल्तानपुरी आला दर्जे के ग़ज़लकार थे. उन्होंने फ़िल्मों में गीत सिर्फ अपनी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए लिखना शुरू किया. इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह भी उनकी शख़्सियत का एक ख़ूबसूरत पहलू था.

बतौर नग़मानिगार मजरूह सुल्तानपुरी का फ़िल्मी सफ़र कारदार साहब की फिल्म शाहजहां से शुरू हुआ था. कारदार उन्हें नौशाद के पास ले गए थे. उन्हें एक धुन सुनाई गई और इसपर बोल लिखने के लिए कहा गया. इसपर मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गीत था – ‘जब उसने गेसू बिखराए, बादल आये झूम के…’ यह 1946 में आई फिल्म शाहजहां के सबसे मक़बूल गानों में से था. इसी फ़िल्म के लिए उनका लिखा और केएल सहगल का गाया – ‘जब दिल ही टूट गया, हम जीके क्या करेंगे’ हिंदी फ़िल्मी तवारीख़ के सबसे मक़बूल गीतों में आला मुक़ाम रखता है. यह उनका शुरुआती गीत था. सहगल को यह गीत इतना पसंद आया था कि वे चाहते थे इसे उनके जनाज़े में ज़रूर बजाया जाए.

एक मशहूर गुलकार व अदाकार के मुंह से मजरूह सुल्तानपुरी के शुरुआती नग़मे के लिए इससे बड़ी तारीफ़ भला क्या हो सकती थी.

इन्हीं नग़मों के साथ मजरूह की दोस्ती नौशाद से भी शुरू हुई और बाद में दोनों रिश्तेदार भी बन गए. मजरूह सुल्तानपुरी की बेटी की शादी नौशाद साहब के बेटे के साथ हुई थी.

बतौर नग़मानिगार मजरूह सुल्तानपुरी से जुड़ी एक बेहद ख़ास बात यह है कि उनका सफ़र तो नौशाद-कारदार-सहगल के ज़माने से शुरू हुआ था लेकिन उन्होंने हालिया ज़माने के कुछ जानेमाने मौसिक़कारों जैसे अनु मलिक, जतिन-ललित से लेकर लीज़्ले लुईस तक के लिए गाने लिखे हैं. ख़ान तिकड़ी पर भी उनके गाने फ़िल्माए जा चुके हैं.

इस लिहाज़ से देखें तो हिंदी फ़िल्मी नग़मों का एक लंबा दौर मजरूह सुल्तानपुरी के नाम रहा है. उनका फ़िल्मी करियर पचास सालों से ज्यादा लंबा रहा. हिंदी फ़िल्मी तवारीख़ में यह किसी अजूबे से कम नहीं है.

बतौर नग़मानिगार मजरूह सुल्तानपुरी से जुड़ी एक बेहद ख़ास बात यह है कि उनका सफ़र तो नौशाद-कारदार-सहगल के ज़माने से शुरू हुआ था लेकिन उन्होंने हालिया ज़माने के कुछ जानेमाने मौसिक़कारों तक के लिए गाने लिखे हैं.

इतना बड़ा वक़्त किसी नग़मानिगार और अदीब के हिस्से में यूं ही नहीं आ सकता. ऐसा तभी हो सकता है जब उस कलाकार के वजूद में बदलते दौर को लेकर एक लचीलापन हो. मजरूह में नए जेनेरेशन के साथ काम करने की ख्वाहीश के साथ-साथ अपने नग़मों को बेहतर बनाए रखने की अजीब-ओ-ग़रीब ललक थी. इसकी मिसाल ‘हम किसी से कम नहीं’, ‘क़यामत से क़यामत तक’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘अकेले हम अकेले तुम’, ‘खामोशी – द म्यूज़िकल’ जैसी फ़िल्मों के गीत हैं. इनमें ख़ूबसूरती भी हैं और जज़्बात भी.

हालांकि 1960 और 1970 का सालों में उनके गीतों का सुनहरा दौर कहा जा सकता है. ‘चुरा लिया है तुमने…’ , ‘बांहों में चले आओ…’, ‘ऐसे न मुझे तुम देखो…’, ‘अंग्रेज़ी में कहते हैं …’ से लेकर ‘छोड़ो सनम, काहे का ग़म’ तक हर बार नया कहने का उनका अंदाज़ नया ही बना रहा. यह वक़्त की नब्ज़ को पकड़ना भी था और वक़्त के साथ चलना भी. वरना बहुत ही मुश्किल होता ‘दिल ही टूट गया’, या ‘हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह’ , या ‘उसको नहीं देखा हमने ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी’ जैसे पुराने चलन लेकिन गहरे व मा’नीख़ेज़ उर्दू के नग़मों के नग़मानिगार के लिए यह सफ़र तय कर पाना.

मजरूह सुल्तानपुरी ने अपनी ज़िंदगी में लगभग 300 फिल्मों के लिए 4000 गीत लिखे हैं. फ़िल्मों के तादाद का नग़मों के हिसाब से कम होना दिखाता है कि वे दूसरे नग़मानिगारों की तरह एक दो गीत के लिए किसी फ़िल्म से नहीं जुड़े, वे जहां रहे पूरी तरह जुड़कर, पूरे मन से लेकिन अपनी शर्तों पर रहे.

अपनी शर्तों पर जीने से जुड़ा उनकी ज़िंदगी का एक अजीब-ओ-ग़रीब वाक़या भी है. यह 1949 की बात है. उनके ऊपर सरकार के ख़िलाफ़ गीत लिखने का इल्ज़ाम लगा और उन्हें जेल भेज दिया गया. मजरूह सुल्तानपुरी के सामने शर्त रखी गई कि वे माफ़ी मांग लेते हैं तो उन्हें रिहा कर दिया जाएगा लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए.

इस दौरान उनकी फ़ैमली भारी तंगदस्ती में आ गई. जब राजकपूर ने उनके फ़ैमली की पैसों से मदद करनी चाही तो मजरूह ने साफ़ इनकार कर दिया. इसके बाद राजकपूर ने उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए एक गाना लिखने को तैयार किया और इसका मेहनताना उनके फ़ैमली तक पहुंचाया था. यह गाना था – ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल…’ इसे राजकपूर ने 1975 में आई अपनी फिल्म धरम-करम में इस्तेमाल किया था.

मजरूह सुल्तानपुरी को अपनी शायरी के लिए ग़ालिब और इक़बाल सम्मान जैसे बड़े एज़ाज़ मिले थे. वहीं फ़िल्मी गीतों में दोस्ती फिल्म के गीत ‘चाहूंगा मैं तुझे के लिए…’ फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला था. दादा साहब फ़ाल्के अवॉर्ड के हक़दारों में मजरुह पहले नग़मानिगार रहे हैं.

मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरारुल हक़ ख़ान था. अपने वालिद के दबाव में उन्होंने आयुर्वेद और यूनानी मेडिकल की पढ़ाई की थी. पर बाद में जब उनका मन इसमें नहीं लगा तो वे पूरी तरह क़लमकारी में डूब गए. इस दौरान उन्होंने अपने लिए एक नया नाम भी चुन लिया – मजरूह. इसका मायने होता है – ज़ख़्मी.

हालांकि इस मायने से उलट पचास साल लंबे करियर में वे एक डॉक्टर के ही रोल में रहे और आज तक उनके गीत हम सब के लिए कहीं न कहीं मरहम का ही काम करते हैं.