निजीकारण का अलार्म

 

आकिल हुसैन 

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लोकतंत्रि व्यवस्था में समय-समय पर जनता एक उम्मीद के साथ नई सरकार का चयन करती है,ताकि नई सरकार आएगी,तो देश की व्यवस्था बदलेगी। देश का नए स्तर से विकास होगा। देश से महंगाई समाप्त होगी,देश में नए-नए उद्योग लगेंगे,जिससे रोजगार का अवसर लोगों को मिलेगा। परंतू जनता के बहुमत से चुनकर आयी सरकार,जनता के उम्मीदों पर खड़ नही उतर पाती है। तो फिर जनता लोकतंत्र में मिले अपने मताधिकार का प्रयोग कर उस सरकार को उतार कर फिर नई सरकार के हाथों में देश का नेतृत्व सौंपती है। वर्ष 2014 में देश की जनता ने एक उम्मीद के साथ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा व उनकी अन्य सहयोगी पार्टियों को सरकार चलाने का मौका प्रदान किया। लेकिन केन्द्र में मोदी नेतृत्व में सरकार ने विकास का ढ़ोल जरूर पिटा,पंरतू जमीनी हकीकत कुछ और ही वयां कर रही है। आज देश को विकसित बनाने के नाम पर सरकारी संस्थानों का निजीकरण किया जा रहा है।

वैसे 1990 के दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था में नया दौर आया। क्योंकि उस समय की भारत सरकार ने निजीकरण का आगाज़ किया। उस समय कुछ सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रमों में छोटे-छोटे स्टेक्स की बिक्री से देश में निजीकरण की शुरुवात हुई। तब से निजीकरण का फार्मूला देश वासियों के सामने आया। उस निजीकरण फर्मूले का मोदी सरकार भरपूर इस्तेमाल कर सरकारी कंपनियों को एक तरह से बेचने का कार्य कर रही है। यानी जिनका घर है,उनके काम का भी नहीं रह गया है। तथा जो पैसा आएगा,उससे उनका गुजारा भी नही चलेगा। मगर दिक्कत ये है कि वो अपना सामान लेकर बाजार भी नहीं जा सकते हैं। तथा खरीदार को घर भी नहीं बुला सकते हैं। क्योंकि इससे तो इज्जत ही चली जाएगी। तो होता ये है कि कोई होशियार सौदागर आकर कुछ पैसे पकड़ाता है और रात के अंधेरे में चुपचाप वो सामान घर से यूं विदा होता है कि कोई देख न ले। जाहिर है कि हजारों का माल कौड़ियों में जाता है। तथा लाखों का हजारों में। हमें अपने शहर का पता है एवं शहरों में भी ऐसे किस्से कम नहीं हैं। उन्हें भी खूब पता है कि यही सामान कुछ ही दिनों में उनको मिले पैसे से कई गुना कीमत पर बिकने लगेगा। परंतू करें तो क्या करें! इज्जत का सवाल है। लोग क्या कहेंगे, बाप दादा की विरासत बेचकर घर चला रहे हो! अंग्रेजी में भी फैमिली सिल्वर बेचने को गाली जैसा ही माना जाता है। घर भी चलाना है,इज्जत भी बचानी है। तथा बदकिस्मती से कमाई का कोई जरिया नहीं क्योंकि औलाद या तो है नहीं देश,या नालायक है। केन्द्र सरकार एवं डिसइन्वेस्टमेंट यानी सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। दिखने में आसान लगती है। मगर खोलते चलो,तो पर्त दर पर्त पेंच पर पेंच निकलते चलते हैं। एक सवाल का जवाब देंगे,तो तीन नए सवाल खड़े होंगे। तो बात शुरू से ही शुरू करनी पड़ेगी। भारत में वर्ष 1991 में आर्थिक सुधार हुए,तब ये बात मान ली गई कि सरकार का कार्य व्यापार करना नहीं है। परंतू ये बात न सरकार में बैठे लोगों को ही ठीक से हजम हुई। और न ही सरकार ने देशवासियों को यकीन दिला सकी, कि ऐसा करना ही देश के हित में है। फिर उन्हें ये समझने में भी बहुत मुश्किल हुई कि किस कार्य को व्यापार माना जाए। तथा किसे राष्ट्रहित कहा जाए। यानी एयर इंडिया,बीएसएनएल,एचएएल और एचपीसीएल,बीपीसीएल,रेलवे को प्राइवेट हाथों में कैसे दे दिया जाए। आज केन्द्र सरकार आईपीओ के माध्यम से एलआईसी में अपनी हिस्सेदारी से 10 प्रतिशत तक बेचने का कार्य करने जा रही है। जिसे लोग सबसे विश्वासी मानते थे। लेकिन आलम यह है कि लोग एलआईसी में जमा राशि को आनन-फानन में निकाले लगे हैं। वहीं रेलवे एक राज्य से दुसरे राज्य जाने के लिए देश के गरीब-मजदुर का सबसे बड़ा सहारा था। ज्यादा जगहों पर उसका भी निजीकरण कर दिया गया है। जिस कारण आज रेलवे के टिकट के साथ प्लेटफार्म का टिकट तक महंगा हो गया है। क्योंकि उन जगहों पर सरकार के हाथों में पूरा नियंत्रण नही रह गया है। निजी कंपनी उन जगहों पर अपने मनमाने तरिके से रेलवे यात्रा की दरें अब तय करेगा। अगर हम निजीकरण की बात करेंतो दरअसल निजीकरण का अर्थ है कि किसी सरकारी संस्था का नियंत्रण प्राइवेट यानि निजी संगठन के हाथों में जाना। फिर उस संस्था पर सरकार का अधिकार-क्षेत्र खत्म हो जाता है। वह सरकारी से निजी संस्था में तब्दील हो जाती है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो सरकार के स्वामित्व वाले व्यवसायों को निजी संस्था को बेचना निजीकरण है। प्राचीन काल में भी निजीकरण का अस्तित्व पाया गया है। 20वी सदी से पूर्व यूनान में वहाँ की सरकार ने लगभग सभी सरकारी संस्थाओं को निजी क्षेत्र को सौंप दिया था। रोमन साम्राज्य ने भी अधिकतर सरकारी विषयों को निजी संस्थाओ को सौंपा हुआ था। 20वी सदी के बाद नाजी हुकूमत ने जर्मनी में कई सरकारी फर्मो को निजी संस्थाओ को बेच दिया। 1950 के दशक में इंग्लैंड ने भी इस्पात उद्योगों का निजीकरण कर दिया था। अब भारत में भी निजीकरण की मांग उठ रही है। सबसे पहले यह सवाल है कि निजीकरण से भारत को क्या लाभ होगा। सबसे पहले तो निजी संस्था होने से कार्य की गुणवत्ता में सुधार होता है,तो क्योंकि सरकारी संस्था में नौकरशाही का बोलबाला होता है। जिससे काम की गुणवत्ता बहुत खराब रहती है। निजी संस्था के कार्य में निपुणता अधिक होतीं है। निजी संस्था के कार्य में अधिक विकल्प मिलते हैक्योंकि निजी व्यवसाय मानव एवं वित्तीय संसाधनों पर केंद्रित रहते है। जो कि सरकारी संस्था में कतई संभव नहीं है। सबसे खास तो यह है कि निजी संस्था में भ्रष्टाचार की बहुत कम गुंजाईश है। क्योंकि सरकारी संस्थाओं में रिश्वतखोरी की बड़ी समस्या है। तथा निजी संस्था में सरकारी संस्थाओं के भांति राजनैतिक हस्तक्षेप नहीं रहता। निजी संस्था में जवाबदेही सीधे उपभोक्ता को संस्था एवं उसके मालिक की होगी। परन्तु सरकारी संस्था में संस्था की जवाबदेही राजनीतिक हितधारियों को होगी। निजीकरण के कुछ नुकसान भी है। निजीकरण से निजी संस्थाएँ मुनाफाखोरी में लग जाती है। निजी संस्थाएँ आपस में प्रतिस्पर्धा में लग जाती है। जिससे आम लोग दुविधा में पड़ जाते है। निजी संस्थाओं कार्य करने वाले कर्मियों को समय पर ठीक से वेतन भी नहीं देती। निजीकरण से देश में बेरोजगारी भी बढ़ेगी। क्योंकि आर्थिक मंदी में छँटनी होनें की पूरी संभावना रहती है। तथा इससे बहुत सारे कर्मियों की नौकरी जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। सरकारी संस्थाओं पर सरकार दबाव बनाकर सामाजिक भलाई के लिए भी प्रेरित कर सकती है। निजी संस्थाओ से सरकार की आंख हट जाती है। सरकार की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। जिसका कुछ निजी संस्था फायदा उठाने की कोशिश करती है। निजीकरण एवं विनिवेश को अक्सर एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। परंतू निजीकरण इससे अलग है। इसमें सरकार अपनी कंपनी में 51 फीसदी या उससे ज्यादा हिस्सा किसी कंपनी को बेचती है। जिसके कारण कंपनी का मैनेजमेंट सरकार से हटकर खरीदार के पास चला जाता है। लेकिन विनिवेश में सरकार अपनी कंपनियों के कुछ हिस्से को निजी क्षेत्र या किसी और सरकारी कंपनी को बेचती है। सरकार तीन तरह से पैसा जुटाने की कोशिश कर रही है-विनिवेशनिजीकरण और सरकारी संपत्तियों की बिक्री। देश में निजीकरण और विनिवेश एक ऐसे माहौल में हो रहा हैजब देश में बेरोजगारी एक बड़े संकट के रूप में मौजूद है। देश में पूँजी की काफी कमी है। घरेलू कंपनियों के पास पूँजी नहीं है। इनमें से अधिकतर कर्जदार भी हैं। बैंकों की हालत भी ढ़ीली है। विनिवेश के पक्ष में तर्क ये है कि सरकारी कंपनियों में कामकाज का तरीका प्रोफेशनल नहीं रह गया है। तथा उस वजह से बहुत सारी सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही हैं। आज देश में विनिवेश की धीमी रफ्तार की वजह इसका विरोध भी हो रहा है। क्योंकि इससे नौकरियां जाने का खतरा है। आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने भी सरकारी कंपनियों को प्राइवेट कंपनियों को बेचने का विरोध किया है। क्योंकि प्राइवेट कंपनी किसी को भी नौकरी से निकाल सकती है। नौकरी से निकालने का मतलब ये नहीं है कि कर्मचारी सड़क पर आ जाएंगे। स्टाफ को वीआरएस देना पड़ेगा,प्रोविडेंट फण्ड देना पड़ता है। तथा उन्हें ग्रेच्युटी देनी पड़ेगी। पिछली बार एनडीए सरकार ने 1999 से 2004 के बीच भी राजकोषीय घाटा कम करने के लिए विनिवेश का तरीका अपनाया था। अब सवाल उठता है कि देश की जनता ने मोदी सरकार को विकसित देश बनाने के लिए मौका दिया था,न कि देश के सरकारी संस्थाओं का निजीकरण कर के देश को चलाने के लिए! मोदी सरकार को समझना चाहिए कि निजीकारण,महंगाई और बेरोजगारी ने देश के कई सरकार को उखाड़ कर फेंका है। जिस तरह से मोदी सरकार देश को आर्थिक मंदी से निकाले के नाम पर निजीकारण का खेल,खेल रही है,कहीं यह निजीकारण खेल मोदी सरकार के लिए आने वाले समय में गले की हड्डी न बन जाए!