पश्चिम बंगाल में बेबस भाजपा सीएए के सहारे

आकिल हुसैन

राजनीति में सब कुछ जायज है। अगर ऐसा नही है,तो चुनाव जीतने के लिए भाजपा समय-समय पर पाकिस्तान एवं धर्म के नाम का सहारा क्यों लेती! वह चाहे लोकसभा चुनाव हो या फिर राज्यों में विधानसभा का चुनाव। अब तो भाजपा पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ नागरिकता संशोधन कानून पुरे देश में लागू करने का सहारा लेने जा रही है। जिसका ऐलान संविधानिक पद पर बैठे देश के गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में एक रैली में मटुआ समुदाय के हिंदू अप्रवासियों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि वैक्सीनेशन ड्राइव समाप्ति के बाद पुरे देश में सीएए लागू करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इतना ही नही,बल्कि देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राज्य सभा में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि देश का कोई व्यक्ति हिन्दु,सिख और बोद्ध धर्म से अलग होकर दुसरा धर्म कबूल करता है,तो वैसे व्यक्ति को एससी आरक्षण का लाभ नही मिलेगा। मुझे देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के द्वारा दिए गए जवाब पर यकीन नही हो रहा है। क्योंकि रविशंकर प्रसाद देश में आन्दोलन के लोकनायक जेपी के सार्गिद रह चुके हैं। वह व्यक्ति इस तरह का का ब्यान कैसे दे सकते हैं! लेकिन बाद में मुझे एहसास हुआ कि रविशंकर बाबू तो देश के कानून मंत्री रहने के साथ-साथ भाजपा के नेता भी हैं। तथा अब की राजनीति में सब कुछ जायज हो गया है। अगर ऐसा नही है,तो चुनावों की आहट के साथ ही राजनीति दलों,खासकर भाजपा के नेता धार्मिक भाषा का प्रयोग कर लगते हैं। परंतू भाजपा नेताओं को मालुम नही है कि सामने होने जा रहा विधान सभा का चुनाव कोई बिहार,यूपी या फिर अन्य राज्य में नही हो रहे है। बल्कि अबकी बार का विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल में होने जा रहा हैं। पश्चिम बंगाल की जनता कभी भी जाति-धर्म की राजनीति पर विश्वास नही किया। पश्चिम बंगाल में सिर्फ विकास की राजनीति पर यहां आम जनता भरोसा करती रही है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक तौर पर जितना ही पश्चिम बंगाल समृद्ध है,उतना ही राजनीतिक तौर पर भी पश्चिम बंगाल की जनता जागरूक है। साथ ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक खास उग्र रूप से वास्ता रहा है। क्रांति एवं जुनून राज्य के राजनीतिक मानस में शामिल है। खुदीराम बोस एवं नेताजी बोस स्वतंत्रता आंदोलन इसके उदाहरणों में एक है। परंतू पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का भी पुराना इतिहास रहा है। जिसकी शुरूआत ब्रितानी वायसराय लॉर्ड कर्जन के बंगाल के विभाजन के फैसले के विरोध में 1905 में हुआ था। उसके बाद आजादी मिलने तक बंगाल में हिंसक घटनाओं का सिलसिला चलता रहा था। आजादी के बाद वर्ष 1960 के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन से बंगाल की राजनीति में एक हिंसक मोड़ आया था। नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता चुना,क्योंकि उस समय चुनावों एवं लोकतंत्र पर उनका भरोसा नहीं था।

वर्ष 1947 में भारत को आजादी मिली एवं देश का विभाजन भी हुआ। साथ ही बंगाल का भी विभाजन हुआ। पश्चिम बंगाल का हिस्सा भारत में रह गया। तथा पूर्वी बंगाल का हिस्सा पाकिस्तान में चला गया। तथा बाद में पूर्वी पाकिस्तान कहलाया। दोनों ही ओर खुन खराबे के अलावा विस्थापन एवं शरणार्थियों की समस्याओं से रूबरू होना पड़ा। फिर वर्ष 1971 में भारत के सक्रिय सहयोग से पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र देश होकर बांग्लादेश बना। परंतू इस दौरान एक बार फिर पश्चिम बंगाल को लाखों लोगों को शरण देनी पड़ी। परंतू बीच 1950 में कूच बिहार राज्य ने भारत में मिलने का फैसला किया। तथा 1955 में फ्रांसिसी अंतरूक्षेत्र चंदननगर भी भारत को सौंप दिया गया। ये दोनों ही पश्चिम बंगाल का हिस्सा बने,लेकिन बाद में बिहार का कुछ हिस्सा भी इसमें शामिल किया गया। उस समय देश के साथ-साथ बंगाल में कांग्रेस की तूती बोलती रही थी। आजादी के बाद हुए तीन आम चुनावों में कांग्रेस पश्चिम बंगाल में छायी रही। परंतु पश्चिम बंगाल कांग्रेस में आरंभ से ही अनेक महत्वपूर्ण आंतरिक समस्याएं थीं। जहां अतुल घोष तथा प्रफुल चंद्र सेन एक ओर थे। वहीं अरुण चंद्र गुहा,सुरेंद्र मोहन बोस और प्रफुल्ल चंद्र घोष दूसरी तरफ थे। वर्ष 1967 से 1980 के बीच का समय पश्चिम बंगाल के लिए हिंसक नक्सलवादी आंदोलन,बिजली के गंभीर संकट,हड़तालों एवं चेचक के प्रकोप का समय रहा। इन संकटों के बीच राज्य में आर्थिक गतिविधियाँ थमी सी रहीं। इस बीच राज्य में राजनीतिक अस्थिरता भी चलती रही। आजादी के बाद से 1967 तक तो कांग्रेस का शासन रहा। लेकिन के उसके बाद पश्चिम बंगाल कांग्रेस में दरार आ गयी। अजय मुखर्जी के नेतृत्व में एक दल अलग से काम करने लगा। सभी गैर कांग्रेस दलों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया। परंतु ये प्रयास सफल नहीं हो सका। उस दौरान चुनावों में मुकाबला तीन धड़ों के बीच हुआ। जिसमें पीपल्स यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट(पीयूएलएफ) ,यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट (यूएलएफ) एवं कांग्रेस पार्टी शामिल थी। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी),रेवलूशनरी सोशलिस्ट पार्टी,द रेवलूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी एवं सोशलिस्ट यूनिटी आदि ने ज्योति बसु के नेतृत्व में यूएलएफ का गठन किया था। जबकि अजय बाबू के नेतृत्व में पीयूएलएफ का गठन हुआ था। जिसमें बांग्ला कांग्रेस,फारवर्ड ब्लॉक एवं कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया मुख्य रूप से शामिल थे। इस त्रिकोणीय मुकाबले में पीयूएलएफ को 63,यूएलएफ को 68 सीटें प्राप्त हुई। चुनाव के बाद ये दोनों दल 18 सूत्रीय कार्यक्रम के अधीन एक हो गए। तथा कुछ अन्य दलों के साथ मिलकर अजय बाबू के नेतृत्व में सरकार बनायी। करीब आठ महीनों के लिए बांग्ला कांग्रेस के नेतृत्व में यूनाइटेड फ्रंट ने सत्ता संभाली। इसके बाद तीन महीने प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक गठबंधन ने राज किया। फिर फरवरी 1968 से फरवरी 1969 तक एक वर्ष राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा। एक वर्ष (फरवरी 1969 से मार्च 1970 तक) बांग्ला कांग्रेस ने सत्ता संभाली। फिर आगे के एक वर्ष राष्ट्रपति शासन रहा। वर्ष 1977 में कांग्रेस का पतंग हो गया। तथा वामपंथियों ने सत्ता हासिल कर ली। लेकिन इस दौरान हिंसा का चक्र जारी रहा। वामपंथियों के शासन के शुरुआती काल अपेक्षाकृत शांत रहा। हालांकि सरकार समर्थित हिंसा की छिटपुट घटनाएं होती रही। शुरुआती वर्षों में वामपंथी भूमि सुधारों को लागू करने एवं ग्रामीण इलाकों में विकास कार्यों को लेकर व्यस्त रहे। उनकी ऊर्जा अधिकतर रचनात्मक कार्यों में खप रही थी। परंतू वर्ष 1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था को खोले जाने के बाद वामपंथियों का खेल समाप्त होने की शुरुआत हो गयी। आर्थिक उदारीकरण के विरोधी रहे वामपंथियों की नीतियों ने,खास कर ग्रामीण इलाकों में,रोजगार का भीषण संकट पैदा कर दिया। लोगों के पास कुछ नहीं था,यही वो समय था जब पुराने नेता हाशिये पर चले गए। तथा वामपंथी काडर में गुंडों एवं बाहुबलियों की भरमार हो गई। खास कर बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा रोजमर्रा की बात हो गई। पष्चिम बंगाल राज्य का बेहद मध्यम वर्गीय क्षेत्र कोलकाता के काली घाट का हरीश चटर्जी स्ट्रीट जहां ममता बनर्जी का बचपन अपने छह भाइयों के साथ गुजरा। आज देश के लिए भले ही ममता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। परंतू आज भी वह अपने उसी पुश्तैनी माकन में रहती हैं। जहां उनका बचपन बीता था। यूं तो ममता के राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव भी आए। परंतू सक्रिंय राजनीति की पुख्ता शुरुआत वर्ष 1984 से हुआ। जब ममता ने सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ जाधवपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया। तब ममता के इस फैसले को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगनी शुरू हो गई थी। तथा लोगों को ऐसा लग रहा था कि ममता इस हाई प्रोफाइल नेता के कद के सामने बौनी साबित होगी। परंतू ममता ने महिला शक्तिकरण की मिशाल बनकर सारी अटकलों को दरकिनार करते हुए जीत का परचम लहरा दिया। उग्र स्वाभाव की माने जाने वाली ममता के इस मिजाज का अहसास वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भी हुआ। जब केन्द्र सरकार में खेल मंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के बिग्रेड परेड मैदान की रैली में भाषण देते हुए केन्द्र सरकार पर आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया। खेल मंत्रालय के साथ खेल करने का आरोप लगाते हुए ममता के इस इस्तीफे से कांग्रेस को पशोपेश में डाल दिया था। वर्ष 1996 में ममता ने कांग्रेस को सीपीएम की कठपुतली बताकर पार्टी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। ममता बनर्जी की तुनकमिजाजी एवं अस्थिर छवि धीरे-धीरे वामपंथियों से लड़ने में कारगर साबित होने लगी। ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को सर्वभारतीय तृणमूल कांग्रेस पार्टी की स्थापित किया। तथा ममता पश्चिम बंगाल की राजनीति में लगातार बढ़ती गयी। ममता को अहसास हुआ कि हिंसक हुए बिना आप सत्तारूढ़ पार्टी का मुकाबला नहीं कर सकते। ममता ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से हाथ मिलाकर रेल मंत्री बन गयी। परंतू एनडीए के साथ भी ममता की जोड़ी ज्यादा दिन तक नही जमी। तथा ममता ने वर्ष 2001 में केन्द्र की एनडीए सरकार से अलग हो गयी। ममता ने एक बार फिर से कांग्रेस का दामन थाम कर गठबंधन कर वर्ष 2004 का लोकसभा एवं वर्ष 2006 का विधानसभा चुनाव लड़ा। लेकिन ममता को चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। ममता के लिए वर्ष 2007 से 2011 तक का समय सर्वाधिक हिंसक वर्षों में से था। सिंगूर में टाटा नैनो कार परियोजना एवं नंदी ग्राम में औद्योगिकरण के लिए किसानों की जमीन के अधिग्रहण पर ममता ने आन्दोलन कर किसान समर्थक के साथ ही उद्योग को विरोध के हथियार का फॉर्मूला बनाकर वाम मोर्चा की सरकार को झुका दिया। सिंगूर एवं नंदीग्राम ने ममता को गांव-गांव तक पहुंचा दिया। जिसका फायदा वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में दिखा। जिस लोकसभा चुनाव में ममता की पार्टी तृणमूल को 19 सीटों पर कामयाबी मिली। वर्ष 2011 में पष्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ममता ने मां-माटी और मानुष का नारा दिया। तथा 34 वर्षो से चली आ रही वामपंथ सरकार को पष्चिम बंगाल से उखाड़ फेका। ममता अपने सरकार के बेहतर कार्य के बदौलत पष्चिम बंगाल की आम जनता के दिलों पर छा गयी। बेहतर विकास कार्य के साथ ममता सरकार बंगाल में वर्ष 2011 से लगातार काविज है। बंगाल में कहावत मशहूर है कि करबो लरबो जितबो। बंगाल के 42 लोकसभा सीट के लिए वर्ष 2019 के आमसभा चुनाव में भाजपा ने अपनी पुरी ताकत झोंक दी। ममता को पता था कि जनता की ममता,बीजेपी पर बरसी तो सूबे में उनका अखंड राज चलाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में ममता बीजेपी और पीएम मोदी से सीधी टक्कर लेती दिखीं। तथा देश के पीएम से टक्कर के साथ 22 सीटों पर ममता की पार्टी ने लोकसभा चुनाव में  कामयाबी हासिल की। अब बंगाल में विधानसभा चुनाव सामने देखते हुए भाजपा अपने पुराने हथियार सीबीआई एवं ईडी आदि का प्रयोग के साथ-साथ ममता की पार्टी में सेंध मारी करते हुए कई विधायकों और पार्षदों को अपने पाले में शामिल कर लिया है। तब भी ममता की संघर्षशील राजनीति के सामने बेबस भाजपा,जय श्री राम के नारों के साथ-साथ नागरिकता संशोधन कानून का सहारा लेकर बंगाल की राजनीति का किला हासिल करना चाह रही है। परंतू पश्चिम बंगाल में ममता के विकास कार्य के सामने धर्म के राजनीति की गोटी नही बैठाना भाजपा के लिए काफी मुश्किल लग रहा है। करण यह है कि पश्चिम बंगाल में करीब 29 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। वहां मुस्लिम मतदाता सरकार के भग्य का फैसला करने में निर्णायक साबित होता रहा है। अब देखना है कि औबेसी की पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी मुस्लिम वाटों का कितना प्रतिशत काट पार्टी है। वैसे राजनीति में कुछ भी कहना मुश्किल होता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास रहा है कि यहां धर्म के नाम पर जनता सरकार नही चुनती है। बल्कि बेहतर विकास कार्य करने वाली सरकार को मौका देती रही है। यही कारण है कि वर्ष 2011 से पश्चिम बंगाल में ममता के नेतृत्व में सरकार चल रही है। वैसे श्री राम मंदिर के बाद अब भाजपा के पास कोई खास मुद्दा नही बचा है। जबकि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 14 फरवरी 2019 को कश्मीर के पुलवामा में हुए एक आतंकी हमले में 40 जवान शहीद हुए थे। तथा उस हमले का जिम्मेदार पाकिस्तान को बताकर लोकसभा में शहीद जवानों की लाशों पर चुनाव जितने का कार्य भाजपा ने किया था। लेकिन उस मामले में करीब-करीब भाजपा बेनकाब होती रही है। भाजपा के पास हिन्दु-मुस्लिम की राजनीति के लिए अब कुछ नही बचा है। तब देश के जिम्मेदार पद पर बैठे गृह मंत्री व भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमीत शाह ने पश्चिम बंगाल में जय श्री राम के नारों के साथ-साथ नागरिकता संशोधन कानून का सहारा लेकर राजनीति की नईया पार लगाना चाह रही है। लेकिन मुस्लिम आबादी को अपने देश के लोकतंत्र एवं संविधान पर पुरा भरोसा है। तथा देश में जारी किसान आन्दोलन ने देश वासियों को अपने देश के लोकतंत्र पर मजबुती के साथ विश्वासी बना दिया है। आज किसान आन्दोलन ने केन्द्र सरकार को बेबस एवं पुरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है। वर्ष 2019 से लेकर मार्च 2020 तक देश में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ चले आन्दोलन को अब किसान आन्दोलन ने मजबुती दी है। तथा आन्दोलनकारियों के हौसले को बढ़ा दिया है। इस लिए नागरिकता संशोधन कानून लागु करने के दम पर पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए अब चुनाव जीतना काफी मुश्किल लग रहा है!

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