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राष्ट्रनायक कौन- अकबर या महाराणा प्रताप?

राष्ट्रनायक कौन- अकबर या महाराणा प्रताप?

हरबंस मुखिया
महाराणा प्रताप की महिमा का बखान वोट बैंक की गोलबंदी का ही हिस्सा है। वो एक राजा थे। उन्होंने आख़िरी सांस तक लड़ाई लड़ी। ये उनका महत्व है और इससे ज़्यादा उनका महत्व नहीं है। अक़बर के सम्राज्य में मेवाड़ बहुत छोटा इलाक़ा था। बाद में महाराणा प्रताप का बेटा जहांगीर का ख़ास बन गया। उनका भाई उनके ख़िलाफ़ लड़ रहा था। ऐतिहासिक तथ्य तो यही हैं। ऐसे में महाराणा प्रताप और उनके राज को कितना महत्व मिलना चाहिए? ऐसा भी नहीं है कि मेवाड़ को पाने के लिए अकबर को बहुत संघर्ष करना पड़ा। राणा प्रताप लड़ते रहे और बाक़ी राजपूत तमाशबीन रहे।
अक़बर ने ना सिर्फ़ एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की बल्कि एक नए ढंग के साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य का चरित्र अलग था। 15 अगस्त 1947 से लेकर अब तक भारत का प्रधानमंत्री शाहजहां के लाल किले से भाषण क्यों देता है? आज़ादी का जश्न लाल किले से क्यों मनाया जाता है। आख़िर शाहजहां के लाल किले में क्या बात है। सुभाषचंद्र बोस ने भी कहा था कि हम तिरंगा लाल किले पर लहराएंगे। आख़िर लाल किले में ऐसी क्या ख़ूबी है कि वह प्रतीक बन चुका है। लाल किला उस राजकाज के चरित्र और संस्कृति का प्रतीक बन चुका है जिसे अकबर ने स्थापित किया था।
अकबर ने एक बार कहा था कि किसी भी धर्म का अपमान ईश्वर का अपमान होता है। उस साम्राज्य का चरित्र यह था इसीलिए उस चरित्र को लेकर आप लाल किले पर जाते हैं। मोदी जी भी इसी लाल किले पर जाते हैं। और मोदी जी तो बिना पीएम बने ही छत्तीसगढ़ में लाल किले की डमी पर भाषण दे चुके हैं।
ये महानता की कोई प्रतियोगिता नहीं है। इतिहास में ऐसी कोई प्रतियोगिता नहीं हुआ करती है। इतिहासकारों के लिए ये महत्वपूर्ण बात नहीं है। इतिहास को आपने इतना बाज़ारू बना दिया है कि अकबर महान था, तो वो महान क्यों नहीं। अब आप कहेंगे वो इतना नीच था तो दूसरा क्यों नहीं। सोचिए कैसा वक़्त है कि एक विधायक कहता है कि महाराणा प्रताप ने हल्दी घाटी का युद्ध जीता था और प्रोफ़सर कहता है कि ठीक है जी संपादित कर दे रहा हूं। ये क्या हो रहा है? अक़बर ने जिस साम्राज्य का निर्माण किया उसका चरित्र आख़िर तक कायम रहा।
राजस्थान में राजपूतों से तादाद बहुत छोटी है। लेकिन राजपूताना का गर्व किसी भी राजस्थानी पर लाद दिया जाता है। हमारे जीवन में राजनीति इतनी धंस चुकी है कि हर चीज़ के वोट मिलने के नज़रिए से देखा जाता है। पद्मिनी को लेकर भी ऐसा ही हुआ जो मलिक मुहम्मद जायसी के साहित्य की किरदार के सिवा कुछ भी नहीं है।

(हरबंस मुखिया, मध्यकालीन भारत के इतिहासकार)