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प्रेम चंद की 138वीं जयंती पर विशेष ….  सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ कलम से जंग छेडने वाले मुंशी प्रेमचंद आज भी जीवित हैं, 

प्रेम चंद की 138वीं जयंती पर विशेष ….  सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ कलम से जंग छेडने वाले मुंशी प्रेमचंद आज भी जीवित हैं, 
अशरफ अस्थानवी
उर्दू-हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार और कथाकार धनपत रॉय उर्फ़ प्रेम चंद जी की आज 138वीं जयंती है इन्हें इनकी जयंती पर शोषित पीड़ित समाज आज इन्हें याद कर रहे हैं, इन्हों ने अपने कलम के माध्यम से समाज को जागृत करने का काम किया, अत्याचार शोषण, अंधविश्वास, पिछड़ापन के ख़िलाफ़ बेजोड़ लिटरेचर लिखा। जो आज भी पढ़ने पर लोगों को अंदर से झकझोर देती है। उनकी कहानियां ईदगाह, पंच परमेश्वर, नमक का दरोगा, पूस की रात, कफ़न  आदि तो हर दौर में समाज का मार्गदर्शन करती रहेंगी 
आज के युग में  मुंशी प्रेमचंद को याद किया जाना बेहद ज़रूरी इसलिए भी है कि उन्होंने उस ज़माने में जिन सामाजिक बुराईयों पर प्रहार किया था वो आज भी मूंह बाए खड़ी हैं।
आज से ठीक 138 वर्ष पूर्व   उन्होंने अपने उपन्यास ” सेवा सदन ” में औरतों का मुद्दा काफ़ी व्यवस्थित तरीक़े से उठाया था। सेवा सदन की नायिका ” सुमन ” परिस्थितिवश वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाती है। सुमन एक जगह विट्ठल दास से कहती है –
” इस मंडी में, मैं ही एक ब्राह्मणी नही हूं, दो चार नाम तो मैं अभी ले सकती हूं, जो बहुत ऊंचे कुल की हैं। उन्होंने जब बिरादरी में अपना निबाह किसी तरह नही देखा तो विवश होकर यहां चली आयीं। जब हिन्दू जाति को ख़ुद लाज नहीं है तब फिर हम जैसी अबलायें उसकी रक्षा कहां तक कर सकती हैं “।
प्रेमचंद इस कहानी के ज़रिए यह सवाल भी उठाते हैं कि क्या ऐसी औरतों का सामान्य जीवन में वापसी संभव है।
प्रेमचंद की कहानी ” सदगति ” में दुखी (दलित नायक) अपने घर में पूजा के लिए गांव के ब्राह्मण को बुलाने जाता है। ब्राह्मण इस शर्त पर चलने को राज़ी होता है कि पूजा कराने से पहले दुखी चमार, ब्राह्मण के घर का वो सारा काम करेगा जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है। मसलन झाड़ू लगाना, घर लीपना, गाय को घास डालना,अनाज के बोरे रखना वगैरह वगैरह। साथ ही वह यह भी शर्त रखता है कि उसके घर के सामने पड़े हुए सूखे पेड़ की लकड़ी को भी उसे चीरना होगा और दक्षिणा तो अलग से लगेगी ही।
बहरहाल भूखे पेट जिस लकड़ी को फाड़ने के लिए दुखी चमार को कहा जाता है उसमें एक गांठ है, जिसे मामूली कुल्हाड़ी से चीरना लगभग नामुमकिन है। ये गांठ रुढ़िवादी समाज का प्रतीक है। उस गांठ पर भूखे पेट कुल्हाड़ी चलाते चलाते दुखी का समय बीतता जाता है। गांठ तो नहीं टूटती लेकिन दुखी चमार की जिंदगी की गांठ ज़रूरत टूट जाती है।
ब्राह्मण के घर के सामने दुखी चमार की लाश पड़ी हुई बारिश में भीग कर सड़ रही है। आख़िर ब्राह्मण किसी दलित को छू कैसे सकता है। ब्राह्मण उसे छूता नही और चमारों की बस्ती में जाकर कहता है कि वो लोग जाकर दुखी की लाश उठा लाएं। लेकिन गांव वाले ऐसा करने से मना कर देते हैं।
इसी असमंजस में समय बीतता जाता है। आखिर पुलिस आने के भय और लाश की बदबू से बचने के लिए, ब्राह्मण दुखी के पैर में एक फंदा डालकर उसे घसीटता हुआ गांव से बाहर ले जाता है और एक कचरे के ढेर में फेंक देता है।
कहानी की शुरुआत में दुखी चमार की पत्नी पंडित जी के बैठने के लिए पड़ोस के ठकुराने से खटिया मांग लाने की बात कहती है जिसपर दुखी कहता है –
” तू तो कभी-कभी ऐसी बात कह देती है कि देह जल जाती है। ठकुराने वाले मुझे खटिया देंगे ! आग तक तो घर से निकलती नहीं, खटिया देंगे ! कैथाने में जाकर एक लोटा पानी माँगूँ तो न मिले। भला खटिया कौन देगा “!
उनकी कालजयी कहानी ” ईदगाह ” के एक पाराग्राफ़ में उनका अंदाज़े बयां देखिए –
अभागिनी अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन और उसके घर में एक दाना तक नही है। आज आबिद होता तो क्या इसी तरह ईद आती और चली जाती ?
इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगौड़ी ईद को ? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद ! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब ? उसके अंदर प्रकाश है और बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए लेकिन हामिद की आनंद-भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।

प्रेम चंद आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी बातें उनके कार्यकलाप तथा उनकी रचनाएँ सदा हम लोगों का मार्गदर्शन करती रहेंगी 
जिस्म तो जिस्म है एक दिन ख़ाक में मिल जायेगा,
तुम बहरहाल किताबों में पढोगे मुझको !!