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मोहम्मद रफ़ी साहब को भारत रत्न से नवाज़े सरकार : रफ़ियन्स

मोहम्मद रफ़ी साहब को भारत रत्न से नवाज़े सरकार : रफ़ियन्स
 
(मोहम्मद रफ़ी साहब की यौम-ए-वफ़ात पर ख़ास रिपोर्ट)
 
फ़ैसल रहमानी
हर चेहरा ग़मज़दा, हर आंख में आंसू और हर क़दम तेज़ी से उठ और दौड़ रहा था अपने बेहद अज़ीज़ के आख़िरी सफ़र में शामिल होने के लिए। इस बात से बिल्कुल बेपरवाह कि बारिश और कीचड़ ने दुश्वारियां बढ़ा दी हैं। शायद सभी को ये एहसास हो गया था कि आसमां से आ रहा ये आम पानी नहीं बल्कि ऊपरवाले का वो दर्द है, जो उसकी आंखों से छलक रहा है। मुम्बई (उस वक़्त बॉम्बे) जैसे उस दिन थम सी गई थी। ये ग़मज़दा, रंजीदा, संजीदा और रोती हुई भीड़ चीख़-चीख़कर गवाही दे रही थी कि जाने वाला कितना अहम, कितना अज़ीज़ और कितना मख़सूस था उनके लिए। उनका एक ऐसा नुक़सान हुआ था जिसकी भरपाई ताज़िन्दगी नहीं होनी थी। आज 38 साल गुज़र जाने के बाद भी  मुहम्मद रफ़ी साहब की अज़मत, उनका जादू, उनकी मक़बूलियत न केवल ज्यों की त्यों क़ायम और बरक़रार है, बल्कि इसमें दिन-ब-दिन और इज़ाफा ही हो रहा है। आज ‘रफ़ी साहब’ की बरसी है। 38 साल पहले के उस दिन के मंज़र और माहौल को ध्यान में रख कर लिखते-लिखते मैं ख़ासा जज़्बाती हो गया।
आज रफ़ी साहब को गुज़रे 38 साल हो चुके हैं। लेकिन रफ़ी साहब के चाहने वालों के लिए यह दिन काफ़ी अहम है। उनके दुनिया से रुख़सत होने के दिन को बड़ी ही अक़ीदत और मोहब्बत से याद करते हैं और अपने-अपने अंदाज़ में ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं। इस ख़ास मौक़े पर पेश है सुरों के बादशाह को स्टार न्यूज़ टुडे की जानिब से ख़िराज-ए-अक़ीदत :
कहा जाता है कि दुआएं जादू की तरह होती हैं, वह रुके और थमे हुए आब को मुसलसल करती हैं, फूलों को खिलाती हैं, बच्‍चों को तरक़्क़ी बख़्शती हैं और हुनर को उसके मुक़ाम तक पहुंचाकर पूरी दुनिया में रौशन कर देती हैं। दुआएं मां की लबों से निकलती हैं और हिफ़ाज़त का साया बन जाती हैं। बज़ुर्गों की हथेलियां सिर पर घूमती हैं, तो मोहब्‍बत से नवाज़ती हैं। और जिस दिन किसी फ़क़ीर की झोली से निकलती है, तो बरकत और रहनुमाई बरसाती है, इल्‍म से लबरेज़ कर देती हैं और यक़ीन मानिए मोहम्‍मद रफ़ी बना देती हैं।
बताते तो यह भी हैं कि रफ़ी साहब के बड़े भाई की नाई की दुकान थी, रफ़ी साहब का काफ़ी वक्त वहीं पर गुज़रता था। पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर 1924 को एक मिडिल क्लास मुस्लिम फ़ैमिली में जन्मे रफ़ी साहब जब छह साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुज़रने वाले एक फक़ीर के पीछे लग जाते थे, जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज़ रफ़ी साहब के मन को भा गई। वो उसकी नक़ल करने लगे थे। इस नक़ल में भी उनकी महारत देखकर लोगों को उनकी आवाज़ भी पसन्द आने लगी। लोग नाई की दुकान में उनके गाने की तारीफ़ करने लगे। एक दिन उस फ़कीर ने भी रफ़ी साहब की आवाज़ सुना। उसने देखा कि फक़ीरी गीत गाते वक़्त नन्हें रफ़ी के दिल में ख़ास तरह के अक़ीदत के जज़्बात उभर जाते थे। यह देख फक़ीर बहुत खुश हुआ और छह साल के नन्हें रफ़ी को उसने दुआओं से नवाज़ते हुए कहा, “बेटा एक दिन तू बहुत बड़ा फ़नकार बनेगा।” दुआओं का असर हुआ कि अपनी सदगीभरी आवाज़ से उन्होंने पूरी दुनिया को अपना दीवाना लिया। मोहम्मद रफ़ी साहब के बड़े भाई हमीद ने उनके मन में मौसिक़ी के लिए बढ़ते रूझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढ़ने के लिए उनकी हौसला अफ़ज़ाई की।
लाहौर में मोहम्मद रफ़ी साहब मौसिक़ी की तालीम उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ान से लेने लगे और साथ ही उन्होंने ग़ुलाम अली ख़ान से हिंदुस्तानी क्लासिकल संगीत भी सीखना शुरू कर दिया। एक बार हमीद रफ़ी साहब को लेकर केएल सहगल के शो में गए। लेकिन बिजली नहीं रहने की वजह कर केएल सहगल ने गाने से इंकार कर दिया। हमीद ने प्रोग्राम के इंतेज़ामिया से गुज़ारिश की कि वह उनके भाई रफ़ी को गाने का मौक़ा दें। इंतेज़ामिया के राज़ी होने पर रफ़ी साहब ने पहली बार 13 साल की उम्र में अपना पहला गीत स्टेज पर पेश किया।
सामयीन के बीच बैठे मौसिक़ार श्याम सुंदर को उनका गाना बहुत ही अच्छा लगा। उन्होंने रफ़ी साहब को मुंबई आने का न्यौता दिया। श्याम सुदंर के मौसिक़ी में रफ़ी साहब ने अपना पहला गाना “सोनिये नी…. हिरीये नी….” प्ले बैक सिंगर ज़ीनत बेगम के साथ एक पंजाबी फ़िल्म ‘गुल बलोच’ के लिए गाया। वर्ष 1944 में नौशाद साहब के मौसिक़ी में उन्होंने अपना पहला हिन्दी गाना “हिन्दुस्तान के हम हैं…..” फ़िल्म ‘पहले आप’ के लिए गाया। रफ़ी साहब ने अपने सिने करियर में लगभग 700 फ़िल्मों के लिए 26 हज़ार से भी ज़्यादा गीत गाए। उन्होंने हर ज़ुबान में गीत गाकर उन ज़ुबानों के जानने वालों को भी दीवाना बना लिया था। बात 1944 की थी, तब जब मोहम्मद रफ़ी साहब नौशाद साहब के नाम एक सिफ़ारशी ख़त लेकर बॉम्बे आ गए थे। नौशाद ने इस ख़त का एहतेराम किया और रफ़ी साहब की आवाज़ सुनी। उनकी आवाज़ सुनकर वो ऐसे मदहोश हुए मानो कोई फ़रिश्ता उनके सामने गा रहा हो, नौशाद ने रफ़ी को हिन्दी फ़िल्म ‘पहले आप’ में गवाया और इस गाने के लिए उन्हें 50 रुपए मेहनताना भी दिए गए। यहां से शुरू हुआ रफ़ी साहब का जद्दोजहद। पहली कामयाबी मिली फ़िल्म जुगनू के गीत ”बदला यहां वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है…..” से। 1946 में फ़िल्म ‘अनमोल घड़ी’ में “तेरा खिलौना टूटा….” ने उन्हें कामयाबी की नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। देखते ही देखते कोटला सुल्तान सिंह का फ़ीकू अब मोहम्मद रफ़ी बन चुका था, जिसमें नौशाद साहब का भी अहम रोल था। रफ़ी साहब सीधे-सादे और बहुत ही शर्मीले हुआ करते थे। न किसी से ज़्यादा बातचीत न ही किसी से कोई लेना-देना। न शराब का शौक़ न सिगरेट का। न पार्टियों में जाने का शौक़, न ही देर रात घर से बाहर रहकर धमा-चौकड़ी करने की फ़ितरत। एकदम सादे और शरीफ़ थे रफ़ी साहब।
बहुत काम लोग जानते होंगे कि मोहम्मद रफ़ी साहब ने दो शादियां की थीं। पहली शादी उनके ज़िन्दगी के बहुत ही शुरुआती दिनों में हुई थी। तेरह साल की उम्र में उनकी पहली शादी उनके चाचा की बेटी बशीरन बेगम से हुई थी, लेकिन कुछ साल बाद ही उनका तलाक़ हो गया था। इनसे उनका एक बेटा सईद हुआ था। आज़ादी के बाद रफ़ी साहब उन्हें लेकर बॉम्बे आना चाहते थे। लेकिन वो पाकिस्तान में ही रहना चाहती थीं। रफ़ी साहब के दिल में तो बस हिंदुस्तान बसता था। उन्होंने पाकिस्तान में रहने के बजाय हिन्दुतान में रहना पसंद किया और बशीरन बेगम को तलाक़ देकर बॉम्बे चले आए। 1944 में बीस साल की उम्र में रफ़ी साहब की दूसरी शादी सिराजुद्दीन अहमद बारी और तालीम-उन-निसा की बेटी बिलक़ीस बानो के साथ हुई। जिनसे उनके तीन बेटे ख़ालिद, हामिद और शाहिद और तीन बेटियां परवीन अहमद, नसरीन अहमद और यास्मीन अहमद हुईं। रफ़ी साहब के तीन बेटों सईद, ख़ालिद और हामिद की मौत हो चुकी है। ख़ालिद और हामिद का इंतेक़ाल दिल का दौरा पड़ने से हुई थी जबकि सईद की कार हादसे में मौत हुई।
यूं तो रफ़ी साहब ने दिलीप कुमार, देवानंद, राजेन्द्र कुमार, धर्मेन्द्र, शशि कपूर, राजकुमार, जॉय मुखर्जी, विश्वजीत, जॉनी वॉकर, महमूद जैसे नामवर अदाकारों  को बुलंदी तक पहुंचाने में अहम किरदार निभाया। लेकिन शम्‍मी कपूर को उन्होंने नई बुलंदियां दीं। रफ़ी साहब के गायिकी की ख़ास बात यह थी कि वो उस फ़िल्म के अदाकार की आवाज़ और अंदाज़ से मेल खाती लगती थी। यह किसी से छुपा नहीं है कि शम्मी कपूर के हिट और मक़बूल होने में मोहम्मद रफ़ी साहब का बहुत बड़ा रोल है। जिस तरह राजकपूर के लिए मुकेश उनकी आवाज़ बनकर आए, ठीक उसी तरह रफ़ी साहब शम्मी कपूर के लिए थे। शम्मी कपूर के ऊपर फ़िल्माए गए ऐसे कुछ मक़बूल गाने जैसे “चाहे कोई मुझे जंगली कहे……”, “एहसान तेरा होगा मुझपर…..”, “ये चांद सा रोशन चेहरा……”, “दीवाना हुआ बादल……” जो रफ़ी साहब ने गाए थे, ने ऐसी धूम मचाई कि शम्मी कपूर सुपर हीरो की तरह दिखाई देने लगे थे। शम्मी कपूर कहते थे कि ”रफ़ी साहब उनकी आवाज़ है, उनके बिना फ़िल्मों में मैं अधूरा हूं।”
कहते हैं रफ़ी साहब और शम्मी कपूर के बीच जुगलबंदी को देखकर दूसरे अदाकारों को भी लगने लगा था कि अगर रफ़ी साहब की आवाज़ उन्हें मिल जाए तो वे भी चमक सकते हैं। ज़्यादातर अदाकार रफ़ी साहब से उनके लिए गाना गाने की फ़रमाइश करने लगे। दिलीप कुमार व धर्मेन्द्र तो मानते ही नहीं थे कि उनके लिए कोई और फ़नकार गाए। उस वक़्त मन्ना डे, तलत महमूद और हेमन्त कुमार जैसे गायकों का बोलबाला था। माना जाता है कि रफ़ी साहब के आने से इन फ़नकारों की पूछ काफ़ी कम हो गई थी। गायिकी के लिए अपनी ज़िंदगी को वक़्फ़ कर देने वाले उन फ़नकारों की खूबी भी उतनी थी कि ये सब रफ़ी साहब से चिढ़ने के बजाय ख़ुश होते रहे और रफ़ी साहब के गीत भी गुनगुनाते रहे। मन्ना डे तो कहते थे कि नम्बर एक गुलकार तो रफ़ी साहब ही थे। मुझ समेत बाक़ी गुलकार नंबर दो, तीन, चार, पांच जैसे पायदान पर होते थे।
वो 55-60 का दौर था जब रफ़ी साहब की आवाज़ हरेक कानों में गूंजने लगी थी। प्यार-मोहब्बत हो या दर्दभरे नग़मे, रफ़ी साहब की आवाज़ से अल्फ़ाज़ ज़िंदा हो उठते थे और लोगों के दिलों में बस जाया करते थे। इन्ही दिनों एक गीत आया  “चौदहवीं का चांद हो या आफ़ताब हो….।”  इस गीत ने ऐसा ग़ज़ब किया कि हर जवान दिलों के मुंह पर अपने चांद के लिए यही गीत छा गया। लिहाज़ा पहली बार मोहम्मद रफ़ी साहब को इसी गीत के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इसके बाद सन् 1961 में रफ़ी साहब को दूसरा फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड फ़िल्म ‘ससुराल’ के गीत “तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को…..” के लिए मिला।
1965  में ही लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की मौसिक़ी में फ़िल्म दोस्ती के लिए गाए गीत “चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे……” के लिए रफ़ी साहब को तीसरा फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला। साल 1965 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री अवार्ड से नवाज़ा। साल 1966 में फ़िल्म सूरज के गीत “बहारों फूल बरसाओ…..” बहुत मशहूर हुआ। इसके लिए उन्हें चौथा फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला। साल 1968 में शंकर-जयकिशन के मौसिक़ी में फ़िल्म ‘ब्रह्मचारी’ के गीत “दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर…..” के लिए उन्हें पाचवां फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला। और 1977 में छठा और आख़िरी फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड उन्हें ”क्या हुआ तेरा वादा…..” गीत के लिए मिला।
मोहम्मद रफ़ी साहब फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने कम सोख़नवरी के लिए जाने जाते थे। मोहम्मद रफ़ी साहब ने लता मंगेशकर के साथ सैकड़ों गीत गाए थे या यूं कहें कि सबसे ज़्यादा दोगाना उन्हीं के साथ गाया था। लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया था जब रफ़ी साहब और लता मंगेशकर में बातचीत तक बंद हो गई थी। लता अपने गाए हुए गानों पर रॉयल्टी चाहती थीं, जबकि रफ़ी साहब ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की। रफ़ी साहब मानते थे कि एक बार जब प्रोड्यूसर ने गाने के पैसे दे दिए तो फिर रॉयल्टी किस बात की मांगी जाए। दोनों के बीच तक़रार इतनी बढ़ी कि मोहम्मद रफ़ी साहब और लता मंगेशकर के बीच बातचीत भी बंद हो गई। दोनों ने एक साथ गीत गाने से इंकार कर दिया। फ़िल्म इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया। रफ़ी साहब और लता मंगेशकर के डुएट गानों के तलबगारों के बीच मायूसी छा गई। मोसिक़ार परेशान हो उठे। सब लोगों ने अपने-अपने तौर पर उन्हें मनाने की कोशिश करने लगे। लेकिन नाकाम रहे। उस दौर ने फ़िल्म इंडस्ट्री में सुमन कल्याणपुर नाम की एक फ़नकारा का ज़बरदस्त उरूज हुआ, जो लता मंगेशकर की जगह लेने लगी थीं। तक़रीबन चार साल के लंबे वक़्फ़े के बाद अदाकारा नरगिस की कोशिशों से दोनों ने एक साथ फिर से गाना शुरू कर दिया। उनदोनों की दूसरी पारी का पहला डुएट गाना फ़िल्म ‘ज्वेल थीफ़’ का ख़ूबसूरत गाना “दिल पुकारे आरे आरे…” था। इस गीत ने मुल्क भर ही नहीं बैरून मुल्क में भी धूम मचा दी। मोहम्मद रफ़ी साहब ने सिर्फ़ हिन्दी ज़ुबान में ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान की हर ज़ुबान के साथ-साथ कई बैरून मुल्क की ज़ुबानों में भी गाने गाए।
मोहम्मद रफ़ी साहब अपने करियर में छह बार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड से नवाज़े गए। 1965 में रफ़ी साहब को पदमश्री के एज़ाज़ से भी नवाज़ा गया। मोहम्मद रफ़ी साहब बॉलीवुड के एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फ़ैन थे। हालांकि मोहम्मद रफ़ी साहब फ़िल्म देखने के शौक़ीन नहीं थे। लेकिन कभी-कभी फ़िल्में देख लिया करते थे। एक बार रफ़ी.साहब ने अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘दीवार’ देखी थी। दीवार देखने के बाद रफ़ी साहब, अमिताभ के बहुत बड़े फ़ैन बन गए।
1980 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘नसीब’ में रफ़ी साहब ने अमिताभ के साथ डुएट सॉंग “चल चल मेरे भाई…..” गाना गाया था। अमिताभ के साथ इस गीत को गाने के बाद रफ़ी साहब बेहद ख़ुश हुए थे। जब रफ़ी साहब अपने घर पहुंचे तो उन्होंने अपने फ़ैमिली के लोगों को अपने पसंदीदा अदाकार अमिताभ के साथ गाना गाने की बात को खुश होते हुए बताया था। अमिताभ के अलावा रफ़ी साहब को शम्मी कपूर और धर्मेन्द्र की फ़िल्में भी बेहद पसंद आती थी। मोहम्मद रफ़ी साहब को अमिताभ-धर्मेन्द्र की फ़िल्म शोले बेहद पंसद थी। उन्होंने इसे तीन बार देखा था।
30 जुलाई 1980 को ‘आस पास’ फ़िल्म के गाने “शाम क्यूं उदास है दोस्त…..” को पूरा करने के बाद जब रफ़ी साहब ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से कहा “ओके नाऊ आई लीव”। जिसे सुनकर लक्ष्मीकांत प्यारे लाल अचंभित हो गए, क्योंकि इसके पहले रफ़ी साहब ने उनसे कभी इस तरह की बात नहीं की थी।
घर पहुंचने के बाद रात के तक़रीबन 10 बजे रफ़ी साहब को सीने में दर्द हुआ। उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया। याब तारीख 31 जुलाई हो चुकी थी। रात के आख़िरी पहर की वो मनहूस घड़ी आ गई जब रफ़ी साहब ने इस दुनिया-ए फ़ानी को अलविदा कह दिया। 31 जुलाई 1980 यह ख़बर आग की तरह फैल गई। लोगों को जैसे-जैसे यह ख़बर मिल रही थी, वो बेतहाशा रफ़ी मैंशन की तरफ़ दौड़ पड़े।  किसी को यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि उनका चहेता फ़नकार अब इस दुनिया में नहीं रहा। लेकिन सच्चाई तो यही थी कि दिल का दौरा पड़ने की वजह कर ख़ूबसूरत आवाज़ का मालिक शहंशाह-ए-तरन्नुम हमेशा के लिए दोनों जहां के रब से मिलने चला गया।
हां, वह दिन था, 31 जुलाई 1980 का, जिस दिन उस शहर जिसे आज मुंबई कहते हैं, उसका आसमान रो रहा था। उसके आंसुओ की धार ऐसी थी कि पूरा मुल्क भींग चुका था। फ़िज़ां में ख़ामोशी तारी थी, जैसे कोई नश्तर सा टूट के हर दिल में रह गया हो। इसी ख़ामोशी में, इसी मायूसी से भरे सन्नाटे में ‘शहंशाह ए तरन्नुम’ सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जा रहा था। मौसिक़ार नौशाद ये पंक्तियां बरबस ही बुदबुदाने लगे थे –
“कहता है कोई दिल गया दिलबर चला गया,
साहिल पुकारता है समंदर चला गया,
लेकिन जो बात सच है कहता नहीं कोई,
दुनिया से मौसिक़ी का पयम्बर चला गया।”  
सचमुच हज़ारों-हज़ार लोगों का हुजूम तो था, मगर सबके मुंह सिले हुए, आंखें नम, सब एक-दूसरे की तरफ़ देख तो रहे थे, मगर ख़ामोश…! किससे क्या कहें और कैसे कहें कि हमारे बीच उसके सुर तो हैं, मगर सुर सम्राट नहीं है। यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि जो शख़्स कल तक अपनी आवाज़ का दीवाना बनाए हुए था, आज उसका जनाज़ा लोग अपने कंधों पर उठाए हुए हैं। लोग भींगते रहे। अपने सुर-सम्राट को कंधे पर उठाए रहे। इस बीच बारिश के बीच मशहूर अदाकार मनोज कुमार के मुंह से बोल फूटे, “ओह…! सुरों की मां सरस्वती भी अपने आंसू बहा रही हैं आज। कहते हैं न, कि फ़रिश्ते होते हैं, वो जिन्हें अहसास हो जाता है कि दुनिया में जिस काम के लिए ख़ुदा ने भेजा था वो पूरा हुआ। अब कूच कर जाना चाहिए।
जी हां, मोहम्मद रफ़ी साहब को यह एहसास हो गया था कि आज का दिन उनका आख़िरी दिन है। शायद तभी उन्होंने अपने एक गाने की रिकॉर्डिंग पूरी करने के बाद मौसिक़ार लक्ष्मीकांत प्यारे लाल से कहा कि ”ओके नाऊ आई विल लीव।” तब किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि आवाज़ का यह जादूगर सचमुच ऐसी छुट्टी पर जा रहा है, जहां से कभी लौट के नहीं आने वाला। उस दिन अपने मौसिक़ार से कहे गए लफ़्ज़ उनके जीवन के आख़िरी अल्फ़ाज़ साबित हुए। उसी दिन उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह अपने करोड़ों चाहने वालों को छोड़कर इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए रुख़सत हो गए। पीछे रह गई तो उनकी आवाज़ और ऐसा आलम जो सचमुच कभी रफ़ी साहब को भुला न पायेगा।
”जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे,
तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे…”
जिस रफ़ी साहब ने उनके कानों में जादू घोला था उसकी आख़िरी सफ़र के दिन फफक पड़े थे नौशाद। बाद में उन्होंने इस दिन को याद करते हुए कहा था कि -”रमज़ान-उल-मुबारक के मुक़द्दस महीने में जुमा-ए-तुल-विदा के दिन मोहम्मद रफ़ी साहब का इंतेकाल हुआ था। बांद्रा की बड़ी मस्जिद में उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा हुई थी। पूरा ट्रैफ़िक जाम हो गया था। क्‍या हिंदू, क्या मुसलमान,क्या सिख, क्या ईसाई हर क़ौम सडकों पर आ गई थी। जनाज़े के पीछे जो लोग नमाज़ में शरीक हुए थे उनमें राजकपूर, राजेन्द्र कुमार, सुनील दत्त, किशोर कुमार के अलावा इंडस्ट्री के तमाम लोग मौजूद थे। हर मजहब के लोगों ने उनको कंधा दिया।” हज़ारों लोगों का जो हुजूम उमड़ा था, वो मोहम्मद रफ़ी साहब के लिए ही था। यहां तक कि आसमान भी रो पड़ा था। जनाज़े के सफ़र के दौरान पानी लगातार बरसता रहा था। क़ुदरत भी मानो अपने अज़ीम फ़नकार को अलविदा कह रही थी। मगर उनकी रूह हर दिल को कह रही थी – तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे।
लेकिन अफ़सोस कि भारत सरकार ने इस अज़ीम फ़नकार को भुला दिया। अपने मुल्क से इतनी मुहब्बत करने वाला शख़्स जिसने अपनी आवाज़ से हिंदुस्तानी फ़ौज में जंग के वक़्त एक नया जोश भर दिया था, जो अपने भजन से भक्ति का एक माहौल क़ायम कर देता था, जो रोमांस को एक नया आयाम दे देता था, जिसकी ग़ज़ल दिल-ओ-दिमाग़ पर छा जाती है, जो अपने मुल्क का सक़ाफती नुमाइंदा था। ऐसे शख़्स को अगर भारत सरकार ‘भारत रत्न’ से नहीं नवाज़ती है तो ये सिर्फ रफ़ी साहब के साथ नाइंसाफ़ी नहीं होगी बल्कि पूरी दुनिया के हर उस रफ़ियन्स के साथ भी नाइंसाफ़ी होगी जो हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के कोने-कोने में फैले है। मैं दुनिया में फैले तमाम रफ़ियन्स की जानिब से अपने मुल्क की सरकार से गुज़ारिश करता हूं कि शहंशाह-ए-तरन्नुम रफ़ी साहब को “भारत रत्न” से नवाज़ा जाए।