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इन्साफ़ सबकी ज़रूरत! सबकी ज़िम्मेदारी

इन्साफ़ सबकी ज़रूरत! सबकी ज़िम्मेदारी

हाफ़िज़ मुह़म्मद हाषिम क़ादरी मिस्बाह़ी
अल्लाह तअ़ाला सारी दुनिया का पैदा फ़रमाने वाला और अपने बन्दों की तमाम ज़रूरतों को पूरी करने वाला है। इस दुनिया में जिस तरह इन्सानों को ज़िन्दा रहने के लिये खने पीने की ज़रूरत है इसी तरह समाज में अमन व चैन से रहने के लिये न्याय (इन्साफ़) भी ज़रूरी है। रब्बुल आलमीन ने तमाम इन्सानों को हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की नस्ल से पैदा फ़रमाया और इसी दि नही समाज (मुअ़ाशरा) में इन्साफ़ की बुनियाद रख दी। कु़रअ़ाने करीम जो सारी दुनिया-ए-इन्सानियत की हिदायत के लिये नाज़िल हुआ, उसमें अल्लाह तअ़ाला ने वाज़ेह़ तौर पर इन्सानों को इज़्ज़त का मक़ाम अ़ता फ़रमाया।
तर्जुमाः और बेशक हमने औलादे आदम को इज़्ज़त दी। (अल-क़ुरअ़ानः सूरह बनी इस्राईल 17, आयत 70)
यानी इन्सानों को इल्म, अक़्ल, कु़व्वत गोयाई दी और दुनिया व आखि़रत संवारने की तदरबीरें सिखाईं, तमाम चीज़ों पर ग़लबा अता फ़रमाया वग़ैरह वग़ैरह।
दूसरी जगह इरशाद फ़रमायाः तर्जुमा ऐ लोगो! अपने रब से डरो, जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया, उन दोनों कसरत से मर्द व औरत फैला दिये और अल्लाह से डरो, जिसके नाम पर एक दूसरे से माँगते हो और रिश्तों को तोड़ने से बचो। बेशक अल्लाह तुम पर निगहबान है। (अल-कु़रअ़ानः सूरह निसा 4, आयत 1)
रिश्ते तोड़ने और अल्लाह से डरने और निगहबान की बात कहकर अल्लाह ने इन्साफ़ की अहमियत को बताया और समाजी न्याय (इन्साफ़) को मोह़सिने काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने आखि़री ख़ुत्बे में इस तरह बयान फ़रमायाः ‘‘तुम सब एक आदम अलैहिस्सलाम की औलाद हो और आदम अलैहिस्सलाम मिट्टी से बने थे, पस किसी अ़रबी को किसी अजमी पर कोई फ़ज़ीलत नहीं और किसी अजमी को किसी अ़रबी पर कोई फ़ज़ीलत नहीं। इसी तरह किसी गोरे को किसी काले पर या किसी काले को किसी गोरे पर कोई फज़ीलत नहीं। सिवाये उसके जो मुत्तक़ी हो। वही अल्लाह के नज़दीक मुअजि़्ज़ व मुकर्रम है जो तुममें सबसे ज़्यादा परहेज़गार है। (सह़ीह़ तरग़ीबः ह़दीस 2964)
इस्लाम मुसावात का दरस देता है, कु़रआन व अह़ादीस में इस बात पर बहुत ज़ोर दिया गया है, अम्बिया-ए-किराम ने जो तालीमात दुनिया को दीं उनमें समाजी अदल व इन्साफ़ को मरकज़ी है़सियत हासिल हे। नबी-ए-रह़मत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया किः तुमसे पहले क़ौमे इसलिए तबाह व बर्बाद हुईं कि जब उनके छोटे तबके़ के लिये जुर्म करते तो उन्हें सज़ा दी जाती और जब उनके बड़े तबके़ के लोग जुर्म करते तो उन्हें छोड़ दिया जाता। हु़ज़्ाूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गयाः अल्लाह के मह़बूब वह बन्दा कौन है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः वह शख़्स जो दूसरों के हक़ में बेहतर हो। (अत्तर्ग़ीबः ह़दीस 906)
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात पर खि़लाफ़ते राशिदा के सह़ाबा-ए-किराम ने पूरी तरह से अमल किया, खि़लाफ़ते राशिदा का ज़माना इस लिहाज़ से बहुत अहम है कि उस ज़माने में इस्लामी तालीमात पर अमल हुआ और हुकूमत के उसूल व ज़वाबिते इस्लाम के मुताबिक़ रहे और खि़लाफ़ते राशिदा की यह ख़ुसूसियत भी क़ाबिले ज़िक्र है हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अ़न्हु से लेकर हज़रत अ़ली रज़ियल्लाहु अ़न्हु तक खि़लाफ़त के लिये नामज़दगी में जम्हूरी ;क्मउवबतंबलद्ध निज़ाम क़ायम था। इसमें कोई भी ख़लीफ़ा ऐसा न था, जिसको अमीरूल मोमिनीन (मोमिनों का सरदार, ख़लीफ़ा, मुसलमान बादशाह वक़्त) मुक़र्रर करते में मुसलमान की आम राये और मर्ज़ी शामिल न होे। या जिसे ख़लीफ़ा बनाया गया हो उसे लोगों पर ज़बरदस्ती मुसल्लत कर दिया गया हो। खि़लाफ़ते राशिदा में एक शौराई निज़ाम क़ायम था। मजलिसे शौरा ;ब्वउउपजजममद्ध की बुनियाद पर अमल किया जाता। हर मुसलमान को मशवरा और राये देने का हक़ और हु़कूमत पर नुक्ता चीनी करने का भी हक़ था। अवाम को बुनियादी हु़कू़क़ हासिल थे, सबके साथ बराबर का इन्साफ़ होता था, कोई शख़्स किसी दूसरे के साथ ज़्ाुल्म व ज़ियादती नहीं कर सकता था। ग़ैर मुस्लिमों और दूसरे मज़ाहिब के लोगों को पूरी तरह से मज़हबी आज़ादी देने के साथ साथ उनकी जान, माल, इज़्ज़त आबरू की हिफ़ाज़त भी की जाती थी। ग़र्ज़े सल्तनत इस्लामिया में उस वक़्त एक फ़र्द भी अपने हु़कू़क़ से मह़रूम न था। हज़रत उमर फ़ारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु अ़न्हु एक बा अज़मत, इन्साफ़ पसन्द और अ़ादिल हुक्मरान थे। आपकी हु़कूमत में मुस्लिम व गै़र मुस्लिम दोनों को यक्साँ इन्साफ़ मिला करता था। इसी वजह कर आपका लक़ब फ़ारूक़ भी मशहूर हुआ। अगर समाजी इन्साफ़ का जाइज़ा लिया जाये तक़ाबुल मुतालअ़़ा कम्परिंग स्टडी करने पर मालूम होगा कि पूरी दुनिया में मज़हबे इस्लाम ही समाजी इन्साफ़ी की फ़राहमी का सबसे बड़ा इल्म बिरादर है। जिसने मुअ़ाशरे में मौजूदा तमाम इन्सानों को एक जैसे मक़ाम से नवाज़ा है, इस्लाम में रंग व नस्ल, क़ौम व क़बीला, ज़ात पात, दौलत व सरवत, इख़्तियार व इक़्ितदार, ग़रीब व अमीर होने पर कोई इम्तियाज़ रवा नहीं रखा गया। सैकड़ों बरस बाद 26 नवम्बर 2007 ई0 अक़वामे मुत्तहि़दा ;न्छव्द्ध की जनरल असम्बली ने 20 फ़रवरी को समाजी इन्साफ़ का दिन ;ॅवतसक क्ंल ैवबपंस श्रनेजपबद्ध को क़ायम किया गया। जबसे 20 फ़रवरी को समाजी इन्साफ़ का आलम दिन मनाया जा रहा है, सरकारी व नीम सरकारी इदारों ;छळव्ेद्ध के ज़ेरे एहतिमाम सेमीनार, काॅन्फ्रेंस, मुज़ाकरों का इनऐक़ाद किया जाता है और तरह तरह की तक़रीबात की जाती हैं, जिनमें अहम सियासी शख़्सियात, सह़ाफ़ती मज़हबी रहनुमा, माहेरीन क़ानून, दानिश्वरान और जोडिशियल अफ़सरान अपने खि़ताब में इन्साफ़ की हुसल याबी और उसमें बेहतरी के लिये तजावीज़ पेश करते हैं। कमज़ोर, ग़रीब लोगों के साथ होने वाले ज़्ाुल्म व सितम के ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाई जाती है, समाजी इन्साफ़ का मतलब है कि हर तरह के लोगों के बीच रोज़ मर्रा मामलाते ज़िन्दगी में इस तरह अ़दल व मुसावात बराबरी का फ़ैसला कि किसी के भी हक़ की तल्फ़ी न हो वगै़रह वगै़रह।
समाजी इन्साफ़ की अहमियतः
समाज का मतलब है मुअ़ाशरा अदल को इन्साफ़ कहते हैं। अ़दल व इन्साफ़ हमारे प्यारे मुल्क हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा मसला है, जिधर भी नज़र उठाकर देखें इन्साफ़ नज़र नहीं आयेगा, अगर नज़र भी आयेगा तो बहुत धंुधला, बहुत कमज़ोर। इन्साफ़ के न मिलने से करप्शन (भ्रष्टाचार), देहशतगर्दी, पूरे मुल्क में तरह तरह के मसाइल, बहरान है। लाखों करोड़ो लोगों को अदालतों की तरफ रूख करना पड़ता है और बरसहा बरस इन्साफ़ के हुसूल के लिये अदालतों का चक्कर काँटना पड़ता है, उसके बाद भी वह इन्साफ़ से महरूम रहते हैं, क्योंकि वह इन्साफ़ को ख़रीदने के लिये दौलत नहीं रखते, कोई ख़ुश क़िस्मत ही होता है जिसको इन्साफ़ मिलता है और वही उम्मीद की किरण है जो आज भी अदालतों के चक्कर काँटने के बारे में सोचता भी नहीं और अपना दिल मसोसकर सब्र कर लेता है, जिसे आज कल आम कहावत में यूँ कह लें मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। आज तो यह हाल है जो जितना क़ानून तोड़ने वाला है उसकी इज़्ज़ती ज़्यादा होती है जो इक़्ितदार में रहता है ख़्वाह किसी भी पार्टी से मुन्सलिक हो उसकी इज़्ज़त डर की वजह से की जाती है और वही हीरो होता है, थाने से लेकर ऊपर तक लोग उसकी जी हु़ज़्ाूरी करते हैं और वह ताक़त के नशे में लफ़्ज़े इन्साफ़ को जानता ही नहीं और अगर जानता है तो मानता ही नहीं, लेकिन अपने भाषणों में लफ़्ज़े इन्साफ़ की माला जपता है, चीनी फलोस्पर का कहता हैः ‘‘सियासत मुल्क या मुअ़ाशरे की बुनियाद दो सुतूनों पर क़ायम है ओहदे उसकी इल्मी लियाक़त व हुनर की लियाक़त पर दिये जायें और फ़ैसले इन्साफ़ पर ही हों’’।
दुनिया के बेहतरीन हाकिम हज़रत उमर फ़ारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु अ़न्हु (जिनको तारीख़ में बेहतरीन हाकिम क़रार दिया गया है) आपका फ़रमान हैः ‘‘इन्साफ़ पर ही दीन और दुनिया क़ायम है, इन्साफ़ पर ही मुअ़ाशरे की फ़लाह का दारोमदार है, बिना अ़दल के किसी भी मुअ़ाशरे की तरक़्क़ी, फ़लाह, कामयाबी नामुमकिन है। समाजी इन्साफ़ का क़याम एक अच्छे हुक्मराँ के लिये ज़रूरी है।’’
अल्लाह इन्साफ़ का हु़क्म देता हैः
बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें जिनकी हैं उन्हें सुपुर्द करो और यह कि जब तुम लोगों में फैसला करो तो इन्साफ़ के साथ फैसला करो, बेशक अल्लाह तुम्हें क्या ही ख़ूब नसीह़त फ़रमाता है। बेशक अल्लाह सुनता देखता है। (अल-कु़रअ़ानः सूरह निसा, आयत 58)
इस आयते करीमा में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने दो हुक्म दिये पहला हुक्म यह कि अमानतें उनके ह़वाले करो जिनकी हैं और दूसरा हु़क्म यह कि जब फैसला करो तो इन्साफ़ के साथ्ज्ञ करो। यह दोनों तालीमात इस्लामी शाहकार हैं।
अमानत की अदायेगीः
अमन व अमान के क़याम और हु़कू़क़ की अदायेगी के लिये यह दोेनों बातें अहम हैसियत रखती हैं। अमानत की अदायेगी में बुनियादी चीज़ तो माली मामलात में हक़ार का उसका हक़ दे देना। अलबत्ता उसके साथ और भी बहुत सी चीज़ैं अमानत की अदायेगी मंे दाखि़ल है। जैसे हज़रत अ़ब्दुल्लाह इब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अ़न्हुमा से रिवायत है कि रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः जो मुसलमान का हाकिम बना बफर उसने न पर किसी ऐसे शख़्स को हाकिम मुकर्रर किया, जिसके बारे में यह ख़ुद जानता है कि उससे बेहतर और उससे ज़्यादा किताब व सुन्नत का आलिम मुसलमानों मे मौजूद हे तो उसने अल्लाह तअ़ाला उसके रसूल और तमाम मुसलमानों से ख़्यालात की। (मुअ़जमुल कबीर, उमर बिन दीनार अन इब्ने अ़ब्बासः 11/94 ह़दीस 6216)
इन्साफ़ के साथ फैसला कना निज़ामे अ़दालत की रूह़ ही है कि इन्साफ़ के साथ्ज्ञ फैस्ला किया जाये। अमीर ग़रीब की रिआ़ायत न की जाये सबके साथ्ज्ञ बराबर का इन्साफ़ किया जाये, फैसला देने मे हक़ की रिअ़ायत करे, जिसका दूसरे पर हक़ हो पूरा पूरा दिलाया जाये। रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है कि इन्साफ़ करने वालों को कु़र्बे इलाही में नूर के मिम्बर अता किये जायेंगे। (मुस्लिमः ह़दीसः 1827/1828)
आज हमारे मुअ़ाशरे में समाजी इन्साफ़ ना के बराबर है, हु़कूमत की तर से भी तसाहिली है और सोसायटी में भी ताक़त व कमज़ोर के साथ ना इन्साफ़ी को अपनाये हुए है, इसी वज से समाज में मुह़ब्बत व उलफ़त नापैद हो गई है और हर तरफ बदामनी इन्तेशार बढ़ता जा रहा है। हुकूमतों के लिये लाॅ एण्ड आॅर्डर का मसला पैदा कर रहा हे। सिर्फ इन्साफ़ के दिन को मनाने से इन्साफ़ हासिल नहीं होगा, बल्कि उस पर अमल करके दिखाना होगा। खि़लाफ़ते राशिदा और बाद में भी ऐसे हुक्मराँ रहे हैं, जिनसे लोगों को सुगून और अमन व अमान की नेमत हासिल थी तारीख़ में बहुत से वाक़्यात मौजूद हैं एक इबरत नाक वाक़्या मुलाहज़ा फ़रमायें।
क़ाज़ी षरीह़ का आदिलाना फ़ैसला और उसका असरः
मुसलमान हाकिमों और क़ाज़ियों ने इस्लाम के अ़ादिलाना निज़ाम और बरहक़ फैसलों की ऐसी अज़ीमुश्शान मिसालें क़ायम की हैं कि दुनिया की नज़ीर पेश नहीं कर सकती। जंगे सफ़ीन के मौक़े पर हज़रत अ़ली रज़ियल्लाहु अ़न्हु की एक ज़र्रा ;ैीवनसकमत ळनंतकद्ध गुम हो गई, बाद में जब आप कूफ़ा तशरीफ़ लाये तो वह ज़र्रा एक यहूदी के पास पाई, उससे फ़रमायाः यह ज़र्रा मेरी है क्योंकि मेरे क़ब्ज़े में है, आपने फ़रमायाः हम काज़ी साह़ब से फैसला करवाते हैं, चुनाँचे काज़ी शरीह़ रज़ियल्लाहु अ़न्हु की अ़दालत में पहुँचे। हज़रत अ़ली रज़ियल्लाहु अ़न्हु उनके साथ तशरीफ़ फ़रमा हुए। काज़ी शरीह़ ने कहाः ऐ अमीरूल मोमिनीन! इरशाद फ़रमाइए, फरमायाः उस यहूदी के क़ब्ज़े में जो ज़र्रा है वह मेरी है। मैंने न उसे बेची है और न तोहफ़े में दी है, क़ाज़ी शरीह़ ने यहूदी से फ़रमायाः ऐ यहूदी तुम क्या कहते हो? यहूदी बोला यह ज़र्रा मेरी है, क्योंकि मेरे पास मेरे क़ब्ज़े में है, क़ाज़ी साह़ब ने हज़रत अ़ली रज़ियल्लाहु अ़न्हु से कहाः ऐ अमीरूल मोमिनीन! क्या आपके पास कोई दलील है? फ़रमायाः हाँ! क़न्बर और हु़स्न दोनों इस बात के गवाह हैं, क़ाज़ी साह़ब ने कहाः हु़स्न आपके बेटे हैं और शरई उसूल यह है कि बेटे की गवाही बा पके हक़ में जाईज़ नहीं। जब उस यहूदी ने क़ाज़ी साह़ब का यह अ़ादिलान फ़ैसला सुना तो ह़ैरतज़दा होकर कहने लगाः ऐ अमीरूल मोमिनीन! आप मुझे क़ाज़ी साह़ब के पास लेकर आये और क़ाज़ी साह़ब ने आप ही के खि़लाफ़ फैसला कर दिया। मैं गवाही देता हूँ कि यही मज़हब हक़ और सच है और मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और बेशक मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं। यह ज़र्रा आप ही की है। हज़रत अ़ली रज़ियल्लाहु अ़न्हु उसके इस्लाम कु़बूल करने से बहुत ख़ुश हुए और ज़र्रा और एक घोड़ा मअ़ साज़ व सामान उसे तोह़फ़े में दे दिया।
जहाँ हु़कूमतों की ज़िम्मेदारी है कि अपने रिअ़ाया के साथ इन्साफ़ करे, वहीं अवाम की भी ज़िम्मेदारी है कि जो अपने लिये पसन्द करे वही अपने भाई और दूसरों के लिये पसन्द करे और समाजी इन्साफ़ को क़ायम रखने में मददगार हो। अल्लाह हम सबको इन्साफ़ की अहमियत को समझने और क़ायम करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये। (आमीन सुम्मा आमीन) ीीउींेीपउ786/हउंपसण्बवउ डवइण्रू 09279996221

भ्ंप्रि डवींउउंक भ्ंेीपउ फनंकतप डपेइंीप हाफ़िज़ मो0 हाषिम क़ादरी मिस्बाही
प्उंउ डंेरपक.म.भ्ंरतं त्ं्रअपं इमाम मस्जिद हाजरा रज़विया
प्ेसंउ छंहंतए ज्ञवचंसपए च्ण्व्ण्च्ंतकपीए डंदहव इस्लाम नगर, कपाली, पो-पार्डिह
श्रंउेीमकचनतए श्रींताींदकण् मानगो, जमषेदपुर, झारखण्ड
च्पद.831020 पिन-831020
डवइण् रू 09386379632 मोबाइलः 9431332338

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