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ग़ज़ल

ग़ज़ल

घर से मेरे ज़रा सी जो दौलत चली गई।
यारों के दिल से मेरी मोहब्बत चली गई।

एहसास हो गया मुझे ग़ुरबत के वक़्त में,
दुनियाँ से जैसे आज शराफ़त चली गई।

गुमनाम हो गया हूँ मैं इन्साँ की भीड़ में,
मेरा वक़ार उर मेरी शोहरत चली गई।

ग़ैरों को क्या कहूँ है मेरे घर का माजरा,
बच्चों के दिल से भी मेरी इज़्ज़त चली गई।

हर हाल में जो साथ निभाते रहे मेरा,
उनकी तरफ़ से सारी हिमायत चली गई।

जो लोग घेरे रहते थे दुख दर्द में मुझे,
उन सबकी जैसे आज मुरव्वत चली गई।

ख़िदमत से माँ की दूर न क़ैसर कभी रहो,
वरना कहोगे हाथ से जन्नत चली गई।

सैयद आफ़ताब क़ैसर
चरखारवी