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वोट डालना एक इन्तेहाई संजीदा फ़रीज़ा

वोट डालना एक इन्तेहाई संजीदा फ़रीज़ा

हाफ़िज़ हाषिम क़ादरी मिस्बाह़ी
हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में आम इन्तेख़ाबात को बड़ी अहमियत हासिल है। आम इन्तेख़ाबात की तारीख़ों के ऐलान के बाद इन्तेख़ाबी मुहिम ज़ोर पकड़ती है और क़ाइदेन और अवाम इन्तेख़ाबी जलसों में एक दूसरे के रू-ब-रू होते हैं। पार्टी क़ाइदेन यह बताते हैं कि बह़ैसियत अवामी नुमाइन्दा, वह अवाम के लिये उनकी तरक़्क़ी और फ़लाह व बहबूद के लिये, हम्माजेहती तरक़्क़ी के लिये किस तरह का मन्सूबा रखते हैं।
हर वोट की अहमियत मुस्लिमा हैः
राय दहिन्दा की जानिब से हक़ राय दही से इस्तेफ़ादा करने से पहले अपनी पसन्द के उम्मीदवार को चुनने का भरपूर मौक़ा मिलता है। जम्हूरियत में वोटर एक अहम मक़ाम रखता और हर वोट की अहमियत मुस्लिमा है। 1951 ई0 में नाफ़िज़ होने वाले क़ानून के मुताबिक़ हक़ राय दही से फ़ायदा की उम्र 21 साल थी, जो बाद में 1988 ई0 में 18 साल मुक़र्रर कर दी गई। हर वह इन्सान जिसकी उम्र 18 साल हो जाये, उसको चाहिए कि वह ब-ह़ैसियत वोटर ( राय दहिन्दा ) अपने नाम का इन्द्राज कराये और इन्तेख़ाबात में अपने हक़ राये दही का इस्तेमाल करे।
आज़ाद हिन्दुस्तान में कई मर्तबा इन्तेख़ाबात के मौक़े पर जो वोट डालने बूथ पर गए या जो नहीं भी गए, जो फ़ातेह बनकर उभरे या जिन्होंने शिकस्त खाई, सभी ने यानी जीतने वाले, हारने वाले ने वोट डालने के हक़ को हमेशा एक फ़रीज़ा के तौर पर देखा है। इन्तेख़ाबी मुहिम के दौरान सियासी पार्टियों की जानिब से एक दूसरे के खि़लाफ़ इल्ज़ामात और जवाबी इल्ज़ामात का सिलसिला चल पड़ा है और तंग नज़री, फ़िरक़ा परस्ती की भी कुछ मिसालें दी जा सकती हैं (जो अब बहुत तेज़ी से बढ़ रही है) लेकिन हमारी वसीअ़ क़ौमी यकजेहती, एक दूसरे की मदद का जज़्बा बिला लिहाज़ मज़हब, रंग व नस्ल, हमारा जज़्बा-ए-उख़वत इस पर ग़ालिब है। इन्तेख़ाबी नताइज के ऐलान के बाद हार को ख़न्दा पेशानी से कु़बूल कर लिया जाता है और अवाम के फ़ैसला को मानना ज़रूरी होता है।
लोकसभा और असम्बली के इन्तेख़ाबात के इनऐक़ाद की तमामतर ज़िम्मेदारी, हिदायत, कण्ट्रोलर, तरीक़ाकार वग़ैरह की सूरत में इलेक्शन कमीशन आॅफ़ इंडिया के मुतय्यन क़ानून के मुताबिक़ कोई भी शहरी एक से ज़ाइद ह़ल्क़ों में अपना नाम इन्द्राज बतौरे राय दहिन्दा नहीं करा सकता। ऐसी सूरत में इलेक्शन कमीशन को इख़्तियार ह़ासिल है कि वह इस तरह के नामों को काट दे। इन्तेख़ाबात में करप्शन को रोकना इलेक्शन कमीशन की एक भारी ज़िम्मेदारी है। इन्तेख़ाबात के आज़ादाना और शिफ़ाफ़ इनऐक़ाद के लिये अवाम को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होती है और उन्हें भी तअ़ावुन देना होता है।
सियासत में दाखि़ल होने वाले लोगों की फितरत भी इक़्ितसादी तरक़्क़ी की रफ़्तार के साथ साथ तब्दील होती रहती है। सियासी ताक़त और असर व रूसूख़ की हु़सूली हर नज़र के साथ इन्तेख़बात में मुक़ाबला करने वाले उम्मीदवारों की तादाद में इज़ाफ़ा होता जा रहा है। सियासी ताक़त व कु़व्वत हासिल करने के लिये, वह वोटर को एक क़ीमत देने में पस व पेश कर रहे हैं। उम्मीदवार खुले आम यह ऐतराफ़ करते हैं कि एक असम्बली सीट के लिये एक करोड़, लोक सभा सीट के लिये दस करोड़ से ज़ाईद इन्तेख़ाबी ख़र्चा आता है और दिन ब दिन इस पर ख़र्च बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह यह है कि उम्मीदवार वोटों की ख़रीदारी पर महज़ मुहिम से ज़्यादा ख़र्च कर रहे हैं। मीडिया की इत्तेलाअ़ात के मुताबिक़, उम्मीदवारों ने पिछले इन्तेख़ाबात के दौरान एक वोट के 500 या 1000 रूपये की अदायेगी की थी। जब एक उम्मीदवार वोट को ख़रीदने की पेशकश करना है और वोटर इसको कु़बूल करने पर आमादा हो जाता है तो क्या वोट के इस तक़द्दुस या क़ीमत की बात की जा सकती है। एक वोट के लिये जो भी क़ीमत पेश की जाती है क्या यही इसकी क़ीमत है। कंण्डीडेट वोट की खरीदारी के लिये भारी क़ीमत खर्च कर रहे हैं। क्या कोई बदले में किसी चीज़ की उम्मीद किये बिना रूपया ख़र्च करना है। (ज़ाहिर है न में जवाब होगा) इन्तेख़ाबी उम्मीदवार वोट की खरीदारी पर भारी क़ीमत इसलिए ख़र्च कर रहे हैं कि वह हर हाल में जीत कर वह सियासी कु़व्व्त व ताक़त हासिल करें, जिससे सियासयत में मशग़ूल होकर खर्च कर्दा रूपया से कहीं ज़्यादा कमाये और अपनी तिजोरियों को भरें। हम दाल, नमक, तेल, बस टिकट, रेल टिकट वग़ैरह ख़रीदते वक़्त और दूसरी चीज़ें ख़रीदते वक़्त टैक्स अदा करते हैं ताकि रियासती और मरकज़ी हुकूमत टैक्सों की आमदनी से तरक़्क़ी करें।
अगर हम वोट डालने के लिये रूपये कु़बूल करते हैं तो हम अपना मुस्तक़बिल रहन (गिर्वी) रख देते हैं। जम्हूरियत में वोट एक मुकद्दस हैसियत ही नहीं रखता, बल्कि एक ज़बरदस्त ताक़त भी रखता है। 1996 ई0 में सिर्फ 17 वोटों की अक्सरियत से गुजरात में वोटर उसे लोकसभा के लिये एक नौजवान ने जीत हासलि की और इसी तरह 1989 ई0 में सिर्फ 9 वोटों से कण्डीडेट को आन्ध्र प्रदेश में इनका पिली से लोसभा के लिये मुन्तख़ब किया गया। दिल्ली में मशहूर फ़िल्मी अदाकार आजहानी राजेश खन्ना से मशहूर बी0जे0पी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सिर्फ 52 वोटों से जीत हासिल की थी। अभी मौजूदा सितम्बर, अक्टूबर 2014 ई0 में महाराष्ट्र के इलेक्शन में 9 मुस्लिम उम्मीदवार सिर्फ एक हज़ार या उससे कम के फ़ासिले से हार गए और बी0जी0पी के 14 कण्डीडेट्स ने सिर्फ साढ़े चार फ़ीसद ज़्यादा वोट मिलने पर जीत हासिल की।
वोटिंग के दिन को पिकनिक डे ;च्पबदपब क्ंलद्ध न बनायेंः
अपने मुल्क, अपनी रियासत की बक़ा के लिए वोटिंग के दिन को यौमे जम्हूरियत की तरह मनायें और ऐसे ख़्वाहिशमन्दों के हक़ में वोट डालें, जो दौलत बटौरने की ग़र्ज़ से नहीं, बल्कि खि़दमात अन्जाम देने के लिये आगे आते हैं। अपनी क़ीमती वोट का इस्तेमाल करें और उन्हें कामयाब करने की कोशिश करें। वोट का इस्तेमाल हमारा संजीदा फ़रीज़ा है। बा सूरत दीगर हम जम्हूरी निज़ाम की ताक़त से मह़रूम हो जायेंगे। दुनिया भर में अगर कसरत में वह़दत की शान कहीं दिखाई देती है तो वह हमारा मुल्क हिन्दुस्तान है। हमारा भाईचारा, हमारी रवादारी, हमारी क़ौमी यहजेहती हमारा इम्तियाज़ है। दुअ़ा है इसे किसी की नज़र न लगे। इसकी बरक़रारी के लिये हिन्दुस्तानी अवाम जद्दो जेहद करते आये हैं और करते रहेंगे और जम्हूरी निज़ाम के लिये वोटिंग में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते रहेंगे। ताकि हर तरफ अमन व सुकून का बोल बाला हो। ब-क़ौल नैल्सन मण्डीला ‘‘अमन का मतलब सिर्फ लड़ाई खत्म हो जाना नहीं है, अमन तब होता है जब सब ख़ुशहाल हों, भले ही वह किसी भी ज़ात, मज़हब, मुल्क, जिन्स और समाज के हों।’’ हम इस बात की पुर ज़ोर कोशिश करें कि वोट ज़रूर डालें और वोट का फ़ीसद बढ़ायें, पूरा का पूरा मुल्क इस मुहिम में लगा है और क्यों लगा है यह अहले शऊर से छुपा नहीं है और इसका फ़ायदा किस को मिल रहा है, आपके सामने है।
जम्हूरी मुल्क में ‘‘वोट’’ डालने का दिन ईद का दिन हैः
जिस तरह हर क़ौम अपने त्यौहारों में ख़ुशियाँ मनाती हैं, इसी तरह मुल्क के हर बाशिन्दे को जम्हूरियत की इस ख़ुशी में शामिल होना चाहिए। यह बात बहुत अहम है कि आप अपने इस हक़ का इस्तेमाल अपनी मर्ज़ी व होश मन्दी से करें, बगै़र किसी डर व लालच के ताकि हुकूमत बनने में आपकी हक़ राय दि हिन्दगी शामिल हो। जैसा कि ऊपर आप पढ़ चुके हैं कि कितने कम वोटों से हार जीत हुई है। उत्तर प्रदेश के पिछले असम्बी के इलेक्शन में समाजवादी पार्टी के 170 एम0एल0ए0 500 या 1000 वोटों के फ़र्क़ से हार गए थे और 16 एम0एल0ए0 500 से कम वोटों के फ़र्क़ से हार गए थे। (हवाला नारायण दत त्रिपाठी साबिक़ बी0बी0सी0 रिपोर्टर, प्रोग्राम यूपी का महाभारत एन0डी0टी0वी0)
सैक्यूलर्र वोटों की तक़सीम सख़्तगीर अनासिर की चाँदीः
इलेक्शन का ऐलान होते ही अनगिनत पार्टियाँ सामने आ जाती हैं और सबकी सब ग़रीबों व मुसलमानों की फ़लाह का दम भरती हैं, लेकिन ऐसा है नहीं, ऐसी पार्टियों और ज़मीर फ़रवशों को वोट बांटने के लिये खड़ा किया जाता है ताकि जो सख़्त गैर तन्ज़ीमें काम कर रही हैं, उनका मक़सद पूरा हो जाये। इलेक्शन की तारीख़ों का ऐलान होते ही सियासी ह़रारत सातवें आसमान पर है। ग़ौर करें कि उत्तर प्रदेश में 22 सीटों पर मुसलमानों की 20 फ़ीसद से ज़ाइद वाटर्स हैं और 60 पार्टियों को मिलाकर 100 से ज़्यादा पार्टीयाँ सर गर्म अमल हैं। जिसमें सब अहम तीन चार पार्टियाँ ही हैं, समाजवादी पार्टी, जिसमें घमसान मचा हुआ है। बहूजन समाज पार्टी, कांग्रेस और बी0जी0पी है। बी0जे0पी0 तो खुल्लम खुल्ला हिन्दुओं के वोट को एक जुट करने में लगी हुई है। इसके लिये वह करोड़ों रूपये खर्च करके रेलियाँ करा रही है और सोशल मीडिया जो इस ज़माने का सुर्पिम पावर है, इसका इस्तेमाल ज़बरदस्त तरह से कर रही है। बी0जे0पी के यूपी के हेड क्वार्टर में पोरटल बनाकर सैकड़ों कम्प्यूटर और टेªंड लोगों की मदद से नाॅन स्टाॅफ़ 24 घण्टे काम कर रही है। एन0डी0टी0वी के रिपोर्टर कमाल खान के मुताबिक़ 8000 से ज़्यादा ;ॅींजे।चच ळतवनचए ज्ूपजजमतए प्देजंहतंउए ल्वनजनइम ज्मसमहतंउद्ध वगै़रह वगै़रह के ज़रिया ज़बरदस्त प्रचार कर रही है, जिस तरह उसने पिछले पार्लियामेंट इलेक्शन में किया था, इस इलेक्शन में इससे ज़्यादा तैयारी व ताक़त से लगी हुई है और लाख के क़रीब राष्ट्रीय स्ंवय सेवकों ;क्ववत जव क्ववतद्ध कनवेेंसिंग के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं। आपकी बातें जो मैन स्ट्रीम मीडिया ;डंपद ैजतममउ डमकपंद्ध में जगह नहीं पा सकती हैं उसे बड़ी आसानी से फैसबुक, इंस्टाग्राम वगै़र हके ज़रिया अपने लोगों तक और पूरी दुनिया तक सैकड़ों में पहुँचा सकते हैं। हमारी ज़िम्मेदारी बनती है तमाम वहम व गुमान को दिल से निकालकर ख़ूब सोच समझकर वोटिंग ज़रूर करें और अपना हक़ इसके ज़रिया लेने की कोशिश करें। आइए अपने मुल्क, अपनी रियासत के लिये दुअ़ा करें कि चार सू अमन व अमान हो, तरक़्क़ी हो, हर शहरी को इसका हक़ मिले और ज़िन्दगी ख़ुशह़ाल हो। (आमीन)
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प्ेसंउ छंहंतए ज्ञवचंसपए च्ण्व्ण्च्ंतकपीए डंदहव इस्लाम नगर, कपाली, पो-पारडिह
श्रंउेीमकचनतए श्रींताींदकण् मानगो, जमषेदपुर, झारखण्ड
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