सड़कें सुनसान, घरों में इंसान, हो रहा है लॉक डाउन का पालन

 

आमस (गया)

लॉकडाउन…मतलब जरुरी चीजों के अलावा बाकी सभी चीजों पर सख्ती से पाबंदी। बेवजह न घर से निकलना,न काम पर जाना, और न ही दोस्तों संग एक जगह जमा होना। और सबके जुबान पर एक ही सवाल कब खत्म होगा ये लॉकडाउन। ये एक ऐसा शब्द है जो अधिकतर लोग पहली बार सुन रहे हैं, और इसका दिल और जान से पालन भी कर रहे हैं क्योंकि कोरोना जैसी घातक वायरस को बढ़ने से रोका जा सके।
कुछ इसी तरह के हालात हैं प्रखंड के NH-2 से सटे बैदा गांव का। 450 घरों की आबादी वाला ये गांव बिल्कुल सुनसान दिख रहा है। सरकार के लॉकडाउन के निर्देशों‌ का‌ पालन करते हुये कोई भी व्यक्ति अपने घरों से नहीं निकल रहा है। इस गांव से होकर क्षेत्र के नीमा,कोरमथु,रमुआचक होते हुये गुरुआ को जोड़ने वाली सड़क पर बिल्कुल सन्नाटा पसरा हुआ है।
गांव में रहने वाले बुजुर्ग अंनीस अंसारी, मुंशी नईमुद्दीन, हाजी अली अनवर और मो0 अशरफ अली ने‌ बताया की अबतक अपने जीवन में इस तरह का बंदी कभी नहीं देखा था। उन्होने बताया की कभी कभी राजनीतिक बंदी एक दो दिन का होता था मगर पुरे देश में लॉककडाउन पहली बार हो रहा है।
वहीं 75 वर्षीय बुजुर्ग मो० उस्मान उर्फ नेताजी ने बताया की ऐसा पहली बार है जब लोग मस्जिद के बजाय अपने घरों में नमाज अदा कर रहे हैं।

*जैसे थम सी गयी है जिन्दगी-*

शिक्षक हिफजुर रहमान रिंकु ने बताया की कोरोना वायरस महामारी ने पुरी जीवन को ब्रेक लगा दिया है। सुर्योदय के साथ पुरे रफ्तार के साथ दौड़ने वाला ये गांव बिल्कुल थम सा गया है। युनिफार्म पहन कर दोस्तों संग अंगड़ाईयां लेते स्कुल जाते बच्चे हों या फिर सुबह की नयी किरण के साथ अपनी ड्युटी पर जाते नौकरी पेशा लोग या रोजी-रोटी की तलाश में भागते कामगार आज कोई नहीं दिखता। वहीं डाक्टर अफजल ने लोगों से इसका पालन करने की अपील करते हुये कहते हैं की इस संक्रमण को बढ़ने से रोकने के लिये सोशल डिस्टेंसिंग ही एक उपाय है क्योंकि अब तक इसका कोई सटीक इलाज वजुद में नहीं आया है।

*भुख को लाकडाउन कैसे करें-*

वहीं कई ऐसे दिहाड़ी मजदुर हैं जिनको इस बंदी में अपने परिवार के लिये दो वक्त की रोटी का जुगाड़ की चिंता हो रही है। रशीद अंसारी, मो० शमीम, अलीम अंसारी, संजय पासवान, महेश पासवान, नागेश्वर मंडल आदि ने बताया की अगर ऐसे ही कामकाज ठप रहा तो हमें एक वक्त की रोटी का इंतेजाम करना भी मुश्किल हो जायेगा।