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बिहार जीत पर तहक़ीक़ी रिपोर्ट

सांप्रदायिक ताकतों को पराजित करके,इतिहास रचने वाला, बिहार विधान सभा के जीत का असल किंग मेकर ” संजय यादव “

इनकी हर चाल में फंसता गया विरोधि ۔ इनकी  गुप्त योजनाओं ने कर दिया था भाजपा का चक्का जाम।

मंसूर आलम इरफ़ानी की रिपोर्ट।

जी बिहार चुनाव जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी, जिसका डंका पूरी दुनिया में बजा, जिसकी जीत हार पर पूरी दुनिया की नजर थी, इस जीत की शांत कहानी लिख रहा था एक ऐसा व्यक्ति जिसे मीडिया ने कभी कवरेज नहीं दि, जिनकी  सेवाओं को मीडिया ने जनता के सामने नहीं लाया, आज मैं हटाने जा रहा हों बिहार एसेंबली जीत के पीछे से कुछ रहस्य, जिससे अब तक नहीं उठ पाया है घूंघट।
बिहार इलेक्शन को जिताने के चर्चे जितने प्रशांत किशोर के रहे,उतने  संजय यादव के नहीं , जितना लोगों ने प्रशांत किशोर को जाना , उतना संजय यादव को नहीं, मगर हकीकत इसके उलट है, कल्पना कीजिये संजय यादव न होते तो शायद आज बिहार में नीतीश की सरकार न होती ,
संजय यादव का प्लानिंग न होता , तो शायद आज बिहार की जनता आज़ाद न होती ,  संजय यादव की मूक आंदोलन नहीं चलती तो शायद बिहार आज सांप्रदायिक ताकतों के हाथ में होता। बिहार विधानसभा जीत की इस कहानी की शुरुआत अभी से नहीं बल्कि पांच साल पहले से  लिखी जा रही थी, उसी वक़्त से जब 2010 के विधान सभा चुनाव में राजद की करारी हार हुई, वह दौर ऐसा था जब बड़े नेता पार्टी छोड़कर जाने लगे थे और ऐसा लग रहा था कि अब राजद का नामोनिशान बिहार से समाप्त हो जायेगा, लेकिन इस चुप्पी सन्नाटा से संजय यादव ने पार्टी को जगाया, और तेजस्वी यादव को साथ लेकर खमूष आंदोलन की नींव डाली, राजद के अंदर युवा विंग विभाग स्थापित किया , इस समय पार्टी में युवा विभाग क्या होता है किसी को पता तक नहीं था,संजय यादव ने  यूथ विंग द्वारा युवाओं को पार्टी से जोड़ना शुरू किया, फिर पार्टी को सोशल मीडिया पर लाया, सोशल मीडिया पर इस आंदोलन को काफी लोकप्रियता मिली, और हर जिले, प्रत्येक ब्लॉक में अलग राजद के नाम से पार्टी कार्यकर्ताओं ने फेसबुक खाता बनाया, जिससे हजारों लाखों की संख्या में युवा जुड़ते चले गए, उसके बाद राजगीर में एक बड़ा बैठक रखकर पूरे बिहार के हर जिला से युवा श्रमिकों को बुलाकर, प्रशिक्षण शिविर लगाया ,और उन्हें  ट्रेनिंग दी, जो कार्यकर्ता वहां से ट्रेंड होकर आए उन्होंने ने जिला से लेकर ब्लॉक स्तर पर लोगों को पार्टी से जोड़ना शुरू किया, उसके बाद चुनाव का वक़्त क़रीब गया ।
चुनाव के क़रीब आते आते संजय यादव ने पार्टी को इस अस्तर पर ला खड़ा कर दिया के नीतीश कुमार को समझ आने लगा कि राजद के बिना बिहार जीतना अब ठेधि खीर साबित होगा, राजद और लालू परसाद की लोकप्रियता को देखते हुए नीतीश कुमार ने साथ आने में ही भलाई समझी, चुनाव की तैयारियों को संजय यादव ने आंतरिक तौर पूरी तरह से हंडल किया, मुस्लिम और यादव कमयूनीकेश को साथ लाने में उनकी  की बड़ी भूमिका रही है, एक तरफ तो उन्होंने सोशल मीडिया, युवा विंग बनाकर लाखों की संखिया में  युवाओं को जोड़ कर राजद का दायरा इतना व्यापक बना दिया कि युवाओं को लगा कि वाकई राजद ही हमारी जीवन में बदलाव ला सकता है, दूसरी ओर जमीनी स्तर कार्यकर्त्ता को भिड़ाकर गुप्त योजना के तहत जमीन को हमवार किया। कार्यकर्ताओं के द्वारा घर-घर जाकर राजद के पक्ष में माहौल को तैयार किया ,उसके बाद तो बिहार में ऐसी हवा चली और ऐसा इंक़लाब बरपा हुआ के सांप्रदायिक ताक़तें ताश के पत्तों  की तरह हवा में ऐसा उड़ा के बिहार से नाम ओ निशाँ मिट गया ।
यह योजनाबंद काम और ये इंक़लाब रातों रात नहीं आया, बल्कि पिछले पांच सालों से संजय यादव ने इसके लिए  मूक आंदोलन चलाया,
योजना बंद निति बनायीं , उसी का नतीजा मिला कि बिहार ने पूरी दुनिया में एक इतिहास रच दिया,
संजय यादव को मीडिया में आने कभी शौक नहीं रहा, मगर मीडिया ने भी उनके इस विशाल करतब को कहीं जगह नहीं दी …. सवाल यह उठता है कि प्रशांत किशोर ने तो बिहार चुनाव केवल तीन महीने अपने सेवा दिए, इसके बदले उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला, तो क्या संजय यादव जिन्होंने बिहार जीत की कहानी लिखी, उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा क्यों नहीं?
एक जिताने वाले को इज़्ज़त तो दूसरे को क्यों नहीं ?
ये एक बड़ा सवाल है ,जिसपर सभों को गौर करने की ज़रूरत है।
जीत में किसी भी व्यक्ति की इतनी बड़ी योगदान  को  इतने आसानी से  अनदेखा कर देना कहां का न्याय है?