आर्थिक मंदी से हांफने लगा है मध्यम वर्ग

 

वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण का खतरा देखते हुए कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश में तालाबंदी यानि लॉकडाउन की घोषणा थी और इस घोषणा के साथ ही प्रधानमंत्री ने विश्वास दिलाया कि इस दौरान जनता की मदद के लिए केंद्र सरकार समेत सभी राज्य सरकारें उनके साथ हैं। लेकिन लॉकडाउन-02 लॉकडाउन-03 के दौरान इस बीच गरीब परिवारों पर लॉकडाउन की भारी मार देखने को मिली है। जो लोग अपनी दिहाड़ी या रोज की कमाई पर निर्भर थे उनका तो पहले ही बुरा हाल हो चुका था। अब तो मासिक कमाने वाले मध्यम वर्गीय परिवारों की भी स्थिति खराब और दयनीय हो चली है। उनके घरों में राशन के लाले पड़े हुए हैं। जानकारों के मुताबिक अप्रैल माह में लगभग 12 करोड़ से अधिक लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा और आगामी माह में ये आंकड़ा ओर बढ़ सकता है। बच्चों के स्कूल की फीस, घर का किराया, राशन खर्च एवं ऋण किस्तों की चिंताओं ने आम नागरिक को अवसाद की ओर धकेल दिया है। दिल्ली के पटेल नगर में एक डॉक्टर से बात करने पर उन्होंने बताया कि आजकल मेरे पास मानसिक अवसाद के मरीजों की तादाद बहुत अधिक है। उनका यही कहना है कि नींद नहीं आती और आने वाले समय की चिंता खाए जा रही है।

जब मेरी बात कुछ इस तरह के दुकानदारों से हुई जिनकी सहरसा ज़िला के सिमरी बख्तियारपुर के अलग अलग बाजार में छोटी छोटी दुकानें हैं। सिमरी बख्तियारपुर के मेन बाजार में छोटी सी कपड़े की दुकान चलाने वाले शेखर कुमार सिंह का कहना है कि मेरी दुकान से मुझे मासिक अच्छी कमाई हो जाती थी लेकिन लॉकडाउन की वजह से दुकान बंद करनी पड़ी है। घर के हालात बिगड़ने पर अब मैं अपने मोटरसाइकिल पर रखकर कॉलोनी में फल भेजता हूं जिससे बमुश्किल महीने का गुजारा हो पाता है। अगर यह स्थिति ज्यादा दिन चली तो मुझे अपनी दुकान बेचनी पड़ सकती है। अगर इस प्रकार की परिस्थिति बनती है तो बिहार सरकार जनता को भोजन या राशन सड़कों पर गाड़ियां लगाकर बांटना पड़ सकता है क्योंकि हालात बद से बदतर होते दिखाई पड़ रहे हैं।

भारत सरकार के उपक्रम ‘भारतीय खाद्य निगम’ के अनुसार देश के पास करीब-करीब सालभर के राशन की पर्याप्त व्यवस्था है, जिसका इस्तेमाल महामारी के दौरान लॉकडाउन की स्थिति में देश के जरूरतमंद लोगों के भोजन की व्यवस्था करने में किया जा सकता है। इसके अलावा नई फसल के आ जाने से इस भंडार में खाद्यान्न का ओर इजाफा हुआ है। एक सर्वे के अनुसार सामान्य हालात में देशभर में जरूरतमंदों को अनाज बांटने के लिए लगभग पचास से साठ मिलियन टन राशन की आवश्यकता पड़ती है। एक अनुमान के अनुसार मई तक देश के पास लगभग सौ मिलियन टन से अधिक खाद्यान्न उपलब्ध हैं। ‘खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग’ (डीएफपीडी) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019-20 में मई माह तक गेहूं का उत्पादन 1062 लाख टन एवं सरकारी खरीद 359 लाख टन रही। वहीँ चावल की बात की जाये तो 1174 लाख टन उत्पादन व 473 लाख टन खरीद हुई। जबकि इस वित्तीय वर्ष में भारत में लगभग तीन सौ मिलियन टन रिकॉर्ड खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान है। इस हिसाब से भारत गरीबों को साल भर से ज्यादा खिलाने में सक्षम है।

आज अगर हम गौर करें तो संपन्न लोग राशन की खरीद में जुटे हुए हैं। इस बीच बड़ी समस्या ये हुई कि लॉकडाउन की घोषणा के बाद लोगों ने परेशान होकर अधिक राशन जमा कर लिया है। जबकि पूरे देश में लॉकडाउन होने के बावजूद जरुरी राशन की दुकानें खुली हैं। उसके बावजूद भी लोग बड़े पैमाने पर राशन की खरीद करने में जुटे हैं। लॉकडाउन के बीच लोगों का अधिक राशन जमा करके रखना और कीमतों के बढ़ जाने से गरीब ही नहीं मध्यमवर्ग भी मुसीबत में आ चुका है। पिछले कुछ दिनों से लगातार तेल की कीमतों में उछाल से ढुलाई का खर्च बढ़ता जा रहा है। छोटे दुकानदार, रेहडी, पटरी और फेरी करने वाले दम तोड़ने के कगार पर है। यहां तक कि बड़े दुकानदार भी अधिक किराए और बिक्री कम होने के कारण, व्यापार को समेटने लगे हैं। गुरुद्वारों के सामने खाने की लंबी-लंबी लाइनें देखी जा रही है। खबरों के अनुसार बहुत से लोग तो आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो रहे हैं।

महामारी के बढ़ते प्रकोप और दहशत ओर खोप के चलते लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं, जिससे साइकिल रिक्शा, ऑटो, टैक्सी, ई-रिक्शा आदि से जुड़े लोग भयंकर संकट का सामना करने पर मजबूर हैं। खानपान, फैशन, कपड़े, आदि कि अगर कोई दुकान खुली भी है तो उससे ग्राहक नदारद है। बाज़ार में इन वस्तुओं की कोई मांग नहीं है, सिर्फ ज़रूरी वस्तुएं जैसे राशन, दूध, सब्जी और फल की ही बिक्री हर छोटे-बड़े बाज़ार में देखने को मिल रही है। जबकि कई जगह देखने में आ रहा है कि ढुलाई की असुविधा होने से भी खाद्य सामग्री में कमी हो रही है। सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि जहां भी खाद्य सामग्रियां स्टॉक में हैं वहां इस्तेमाल नहीं हो पा रही और इससे कालाबाजारी बढ़ गयी है। जिसका सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में राशन से जुड़ी तमाम वस्तुओं की कीमतों में इजाफ़ा हुआ है और साथ ही मौजूदा समय में अचानक खाद्य वस्तुओं की कमी भी देखी जा रही है।

गौरतलब है कि दूसरे काम धंधे और रोजगार बंद होने पर कई लोगों ने सब्जियां और फल बेचना शुरू कर दिया है। एक हिसाब से सब्जियां और फल बेचने वालों की बाढ़ सी आ गई है। लेकिन उपभोक्ता को फिर भी राहत नहीं मिल रही है। सब्जियों और फलों के रेट आसमान पर हैं। जबकि दूसरी ओर किसान का फल और सब्जियां नही बिक पा रही हैं। कई किसानों को सब्जियों के वाज़िब दाम न मिल पाने पर उनको अपनी सब्जियों को नष्ट करना पड़ रहा है। पिछले दिनों एक किसान ने अपने पालक के खेत में ट्रैक्टर चलाने की खबर आई थी। बिहार के जिले सहरसा के आम के किसान ने बताया कि उसका आम 20 से 25 रुपये किलो बिक पा रहा है। बाजार में खरीदार नहीं है। जबकि दूसरी ओर शहरों में आम 100 से 150रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है। दूध बेचने वाले किसानों को मात्र 30-35 रूपये किलो का भाव मिलता है। जबकि उपभोक्ता को यह 55 से 65 रूपये किलो तक में प्राप्त होता है। टमाटर के भाव किसान को मंडी में बस 10-15 रूपये किलो तक प्राप्त हुए जबकि शहरी क्षेत्रों में ये 40 रूपये किलो तक बेचा जा रहा है।

बहरहाल मानकर चलिए कि इस महामारी से ये तो स्पष्ट हो गया है कि अगर लॉकडाउन लंबे समय तक चलता है तो ऐसे में सबसे बड़ी चिंता ये है कि कमाई के सारे रास्ते बंद होने के कारण और सरकार के राशन की वितरण प्रणाली में गड़बड़ी से बड़ी संख्या में लोग गरीबी या भुखमरी के शिकार हो सकते हैं। अगर परिस्थितियों में जल्दी सुधार नहीं होता है। जिसकी संभावना मुझे बहुत कम नजर आ रही है। अगस्त माह के अंत तक बैंक द्वारा दिए गए मोरेटोरियम पीरियड (ऋण स्थगन अवधि) का भी अंत हो जायेगा और सितम्बर माह से बैंक क़िस्त लेना शुरू कर देगा। ऐसे समय में आम आदमी के हाथों में नकदी की किल्लत होने की प्रबल सम्भावना है | रही सही कसर चीन के सीमा पर इस विवाद से शुरू हो गई है ये अपने आप में एक दुर्घटना है।

बहरहाल इन परिस्थितियों में लोगों के लॉकडाउन को तोड़कर सड़क पर आने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। क्योंकि उनके पास अपना कुछ खोने को नहीं है। उनको तो सिर्फ अपना पेट भरने के लिए, खाने के लिए कुछ भी करना पड़े तो वह उस पर उतारू हो सकते हैं। इससे कहीं ना कहीं सामाजिक ताने-बाने की व्यवस्था में गड़बड़ियां पैदा हो सकती हैं। हाल ही में चोरी एवं लूटपाट की खबरें देखने और सुनने को मिल रही हैं। खासकर गांव-देहात के क्षेत्रों में भी ट्यूबवेल मोटर चोरी और अन्य कृषि यंत्रों की चोरी की घटनाओं में इजाफे की खबरें है। इन परिस्थितियों में सरकार को कम से कम इतना करने की जरूरत है ताकि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को ये विश्वास हो जाये कि सरकार उनकी चिंता कर रही है और कम से कम उनके खाने का इंतजाम तो कर रही है।

® चौधरी अफ़ज़ल नदीम
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