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छलका जेएनयू छात्रों का दर्द, कहा- हम भी भारतीय हैं, आतंकी ना समझें

नई दिल्ली। ‘तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ 9 फरवरी को प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जब चेहरा छुपाए कुछ तत्वों ने ऐसे नारे लगाए तो उन्हें अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनकी ये देशविरोधी हरकत विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हजारों छात्रों को किस तरह मुश्किल में डाल देगी। आज हालत ये है कि तमाम ऐसे छात्र जिनका इस घटना से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था, अपनी पढ़ाई, करियर और रहने की जगह तक को लेकर परेशान हैं। परेशानी सिर्फ उनतक सीमित नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में उनके परिवार भी उनकी सलामती को लेकर फिक्रमंद हैं। आईबीएनखबर ने ऐसे तमाम छात्रों से बात की और इस घटना तथा उसके बाद हुई गतिविधियों पर उनकी राय जानी।

छात्रावास के अभाव में जेएनयू में पढ़ाई कर रहे छात्रों की एक बड़ी संख्या पास के मुनिरका में रहती है लेकिन हाल ही में देश विरोधी गतिविधियों के आरोप में विवादों में आए इन छात्रों को अब मकान मालिकों ने चलता करने का मन बना लिया है। मुनिरका में प्रॉपर्टी डीलिंग का काम कर रहे राजकुमार कहते हैं कि अब जेएनयू में पढ़ने वाले बच्चों पर ज्यादा भरोसा नहीं रहा।

जेएनयू से लैंग्वेज का कोर्स कर रहे आदित्य कहते हैं कि उनके मकान मालिक ने बेटे की शादी का बहाना बनाकर कमरा खाली करने को कहा है। आदित्य का कहना है कि कैंपस के भीतर चल रहा यह पूरा विवाद छात्रों के लिए काफी चिंताजनक है। हम यहां पढ़ने के लिए आए हैं न कि राजनीति के लिए। जिस संस्थान का नाम पहले गर्व से लेता था, आजकल लेने में हिचकता हूं। 9 फरवरी की घटना पर आदित्य कहते हैं कि अब तक यह साफ पता नहीं चल पाया कि उस शोर-शराबे के बीच नारेबाजी किसने की।

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जेएनयू से पढ़ाई कर रहे अनुराग कहते हैं कि कैंपस के भीतर देशविरोधी नारे ही नहीं लगते,सैनिकों की शहादत पर खुशियां भी मनाई जाती हैं, निश्चित रूप से ये चिंता का विषय है। अनुराग कहते हैं कि जेएनयू में कैंपस का माहौल हमेशा से ही काफी जीवंत रहा है और आज भी है लेकिन कुछ तत्व इसे खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अनुराग मानते हैं कि कुछ दिन में सब ठीक हो जाएगा और जेएनयू छात्रों की जीत होगी।

JNU Professors, Students Protest March Against Central Government, Demand Release Of JNUSU President

नौ फरवरी की घटना पर अनुराग कहते हैं कि इस मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है। उस दिन शाम के समय भीड़ काफी ज्यादा थी और चंद लोगों ने विवादास्पद नारे लगाए लेकिन अब तक यह सुनिश्चित नहीं हो पाया है कि वे छात्र कैंपस के थे या नहीं। अनुराग कहते हैं कि दोषियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन उन चंद छात्रों के लिए सभी छात्रों की सुरक्षा से खिलवाड़ करना कहां का न्याय है। अनुराग ने कन्हैया की रिहाई की भी मांग की और कहा कि बिना किसी जांच के उन्हें उठा ले जाना लोकतंत्र की हत्या है।

जेएनयू से एमए कर रहीं श्वेता कहती हैं कि कुछ लोगों द्वारा लगाए गए इन नारों के आधार पर जेएनयू के सभी छात्रों पर लेबल लगा देना वैसा ही है जैसा यह कहना कि आरएसएस के सभी सदस्य महात्मा गांधी की हत्या के समर्थक थे। श्वेता कहती हैं कि जेएनयू में ऐसे छात्रों की कमी नहीं है जो मार्क्सवादी नहीं हैं और जो मार्क्सवादी हैं भी वो सामाजिक न्याय के मुद्दे उठाते हुए भी देश के खिलाफ नहीं बल्कि अपनी नाराजगी सरकार तक सीमित रखते हैं। श्वेता कहती हैं कि अगर कोई शरारत हुई भी थी तो भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले विद्यार्थियों के विरुद्ध कार्रवाई विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से होनी चाहिए थी।

श्वेता का कहना है कि कैंपस में लड़कियां पूरी तरह सुरक्षित हैं और यह माहौल खराब नहीं होना चाहिए। ऐसा लग रहा है जैसे पूरे विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा इस समय अग्निपरीक्षा की दौर से गुजर रही है। कैंपस के भीतर चल रहा विवाद थमने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है।

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रोज आ रहे नए-नए वीडियो से जहां एक तरफ आरोप-प्रत्यारोप का दौर चरम पर है तो दूसरी तरफ सियासी घमासान ने भी जोर पकड़ लिया है। देश विरोधी नारों के खिलाफ शुरू हुई यह लड़ाई अब राजनीतिक संघर्ष की दिशा में बढ़ चुकी है और इस संघर्ष में पिस रहे हैं वो छात्र जो देश-विदेश से न जाने किन-किन अरमानों के साथ इस विश्वविद्यालय में दाखिला लेने आए हैं।

जेएनयू से राजनीति विज्ञान में एमए कर रहे नीरज कहते हैं कि खेतों में काम करके थक कर घर लौटे उनके पापा जब शाम को फोन कर ये कहते हैं कि बेटा इस साल कहीं और एडमिशन नहीं होगा क्या, तो ऐसा लगता है कि आंखों के सामने ही सारे सपने टूट गए हों। पापा को चिंता है सुरक्षा की। नीरज कहते हैं कि पापा ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं और उन्हें जेएनयू के बारे में ज्यादा नहीं पता लेकिन जिस दिन मेरा यहां दाखिला हुआ था तो पापा कैंपस देखकर ही खुश हो गए थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यही कैंपस एक दिन यह कहने को मजबूर कर देगा कि बेटा बाहर मत निकलना, गेट के बाहर लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। नौ फरवरी की घटना पर नीरज कहते हैं कि घटनास्थल पर दोनों दलों के कार्यकर्ता मौजूद थे और ऐसे में देश विरोधी नारे किसने लगाए यह भी पूरी तरह साफ नहीं है। हालांकि कन्हैया की गिरफ्तारी का नीरज खुलकर विरोध करते हैं और उसकी रिहाई की मांग करते हैं।

जेएनयू में विभिन्न आय वर्ग के लोग देश के कोने कोने से अलग अलग अरमान लेकर पढ़ने आते हैं। आज के इस महंगाई के दौर में जहां उच्च शिक्षा के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं वहीं सरकार से मिल रही सब्सिडी के कारण जेएनयू में पढ़ाई काफी सस्ती लगती है, लेकिन आकाश देवांगन कहते हैं कि देश के करदाताओं का यह पैसा पढ़ाई के लिए दिया जाता है, न कि किसी एजेंडे या राष्ट्रविरोधी गतिविधि चलाने के लिए।

नौ फरवरी की घटना के प्रत्यक्षदर्शी आकाश देवांगन का कहना है कि यहां कुछ शरारती तत्व हैं जो अपना एजेंडा हर साल आने वाले नए छात्रों पर थोपने की कोशिश करते हैं जिससे कैंपस का माहौल खराब होने का डर रहता है। हालांकि आकाश कहते हैं कि देश विरोधी नारे यहां इससे पहले नहीं लगे। यहां भीड़ इकट्ठी होने के बाद वाम और एबीवीपी कार्यकर्ता आपस में नारेबाजी करने लगे और मौके का फायदा उठाते हुए कुछ शरारती तत्वों ने देश विरोधी नारे लगा दिए। आकाश कहते हैं कि हम भारतीय थे, हैं और भारतीय ही रहेंगे। चंद लोगों के नारेबाजी से हमें आतंकी कहना गलत है। हम छात्रों को क्यों सजा भुगतनी पड़ रही है।

अपनी अलग चुनावी तरीकों के कारण देशभर में जेएनयू को छात्र राजनीति का केंद्र माना जाता है। यहां पैसे और दबंगई से चुनाव नहीं लड़े जाते बल्कि प्रेसिडेंसियल डिबेट से लेकर कैंपस में जगह जगह दीवारों पर हर मुद्दे पर छात्र संगठन अपनी राय जाहिर करते हैं। जेएनयू छात्र अपने खुले विचारों के कारण भी जाने जाते रहे हैं।निर्भया कांड हो या किसान आत्महत्या, यूजीसी फैलोशिप हो या आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार, जेएनयू छात्रों ने हर सामाजिक मुद्दे पर अपनी सहभागिता प्रदर्शित की है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पीएचडी कर रहे आशीष शुक्ला इन आरोपों को एक सिरे से खारिज करते हैं। शुक्ला कहते हैं कि जेएनयू में हमेशा से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रही है और इस पर रोक लगाने की कोशिश सफल नहीं होगी। शुक्ला कहते हैं कि कैंपस के भीतर सुरक्षा एक मिसाल है और इसकी बराबरी नहीं की जा सकती। देश विरोधी नारों के आरोप को बेबुनियाद बताते हुए शुक्ला कहते हैं अगर कुछ शरारती तत्वों ने कोई शरारत की भी है तो जेएनयू प्रशासन इसके लिए क्षमतावान है कि उस पर कार्रवाई कर सके। इसके लिए पुलिस हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं थी और पुलिस को तत्काल प्रभाव से इस क्षेत्र को छोड़ देना चाहिए ताकि कैंपस के माहौल को फिर से जीवंत बनाया जा सके।

इस पूरे विवाद का असर जेएनयू के पूर्व छात्रों पर भी हो रहा है। जेएनयू के ही एक छात्र की चिंता सबसे अलग है और सबसे वाजिब भी। अपना अनुभव बताते हुए आदित्य जब कहते हैं कि एक कंपनी में उनका चयन सिर्फ इस वजह से नहीं हो पाया कि वो जेएनयू से पढ़े हैं। यही नहीं कंपनी की तरफ से अप्रत्यक्ष रूप से यहां तक कहा गया कि कंपनी को काम करने वाले लोग चाहिए न कि आलोचना करने वाले। निश्चित रूप से यह पूरा मामला छात्रों के दृष्टिकोण से काफी चिंताजनक है और इस समस्या का समाधान भी जल्द ढ़ूंढ़ने की आवश्यकता है ताकि बेगुनाह छात्रों के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ न हो सके।

इन सबके बीच जेएनयू के कुलपति जगदीश कुमार ने छात्रों से अपील की है कि वे हड़ताल खत्म कर कक्षाओं में लौट आएं और पढ़ाई लिखाई फिर से शुरू कर दें। जगदीश कुमार ने कहा कि इस मुद्दे पर हड़ताल की कोई जरूरत नहीं है। विवाद को बातचीत से भी सुलझाया जा सकता है और बातचीत के लिए उनके दरवाजे खुले हुए हैं।