निजीकरण एक व्यवस्था है या नव-रियासतीकरण?सीनियर पत्रकार चौधरी अफ़ज़ल नदीम

 

नई दिल्ली-केंद्र की मोदी सरकार ने सरकारी प्रभुत्व वाले संस्थानों के निजीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत कर दी है। पिछले दिनों केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कैबिनेट की बैठक में पांच बड़ी भारतीय कंपनियों में विनिवेश प्रक्रिया की जानकारी दी थी। सरकार का कहना है कि देश की कई बड़ी सरकारी संस्थान घाटे का सौदा बन कर रह गये है। भारत की अर्थव्यवस्था के ताज़ा आंकड़े इनकी हकीकत बयान कर रही हैं। मौजूदा समय भारतीय राजकोषीय घाटा 6.45 लाख करोड़ रुपए हुआ है।

ऐसे में मोदी सरकार ने फिलहाल पांच सरकारी कंपनियों के निजीकरण का फैसला किया है।यह फैसला आखिर क्यों लिया गया, नीति आयोग के सूत्रों के मुताबिक विनिवेश के लिए भारत सरकार को पूरी 46 कंपनियों की सूची दी गई है, जिसमें से दो दर्जन से अधिक के नामों को तो जल्द हरी झंडी मिलने वाली है। अगर आपको आने वाले दिनों में केंद्र सरकार के कई संस्थानों के निजीकरण की घोषणा हो जाए तो कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी। केंद्र सरकार ने इस साल एक लाख करोड़ रुपए कमाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

केंद्र की मोदी सरकार के लिए सरकारी संस्थानों को निजी हाथों में देना कोई नया नहीं है इससे पहले एनडीए की वाजपेई सरकार में भी राजकोषीय घाटा कम करने के लिए विनिवेश का तरीका अपनाया गया था। तब तो इसके लिए एक अलग मंत्रालय ही बना दिया गया था। हालांकि वाजपेई सरकार के बाद इस परंपरा को कांग्रेस ने भी इस कवायद को आगे बढ़ाया।

लेकिन फ़िलहाल वह मोदी सरकार के फैसले की आलोचना कर रही है। हालांकि हम और आप जानते ही हैं कि जब आप सत्ता पक्ष में होते हैं तब आप के एजेंडे कुछ और होते हैं और जब आप विपक्ष में होते हैं तो आपके एजेंडे कुछ और होते हैं। यही सच्चाई है,उन्ही एजेंडों के तहत आज कांग्रेस विरोध करती नजर आ रही है।

हालांकि केंद्र की मोदी सरकार की विनिवेश प्रक्रिया के फैसले को गैरवाजिब ठहराते हुए कुछ जानकारों का कहना है कि देश के सबसे बड़े अस्पताल मैक्स, मेदांता और फोर्टिस नहीं ‘एम्स’ यानि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान है, जो कि सरकारी है, भारत के सबसे अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज का नाम ‘आईआईटी’ कॉलेज है जो सरकारी हैं, सबसे अच्छे मैनेजमेंट कॉलेज का नाम ‘आईआईएम’ है जो सरकारी हैं, देश के सबसे अच्छे विद्यालय ‘केन्द्रीय विद्यालय’ हैं जो सरकारी हैं, बीमा उद्योग में विश्व की सबसे बड़ी और सबसे अच्छी कम्पनी ‘भारतीय जीवन बीमा निगम’ है जो सरकारी है, देश के एक करोड़ लोग अभी या किसी भी वक़्त अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए देश की सबसे बड़ी वायुयान सेवा ‘एयर इंडिया’ है। जो कोरोना काल जैसी विषम परिस्थितियों में तमाम अलग-अलग देशों से भारत के नागरिकों को वापस लेकर आई थी।इस बात से कभी गुरेज नही किया जा सकता है वास्तविक सच्चाई यही है और इसे कभी भी नकारा नहीं जा सकता .

दुनिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क जो 24 घंटे करोड़ों लोगों को देश में इधर-उधर लाने और ले जाने के अलावा देश में माल वाहक का सबसे बड़ा रोड निभाता है। उस नेटवर्क का नाम ‘भारतीय रेल’ है और वह सरकारी है। दुनिया के सबसे बड़े अनुसंधान केंद्र ‘नासा’ को टक्कर देने वाली ‘इसरो’ पूंजीवादी व्यवस्था के तहत नही सरकारी वैज्ञानिकों की बदौलत चलती है। हालांकि बीएसएनएल और एमटीएनएल जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर सरकारी संस्थाओं को जान बूझकर एक रणनीति के तहत बदनाम करने की साजिश चल रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अगर इन सारी राष्ट्रीय संपत्तियों को निज़ी हाथों में सौंप दिया जाए तो ये सिर्फ़ लूट-खसोट का अड्डा बन जाएँगी। निजीकरण एक व्यवस्था नहीं है बल्कि नव-रियासतीकरण है।

कुछ अर्थशास्त्रियों का अपना अपना तर्क है कि अगर सरकार के हर काम में लाभ की ही सियासत होगी तो आम जनता का क्या होगा? कुछ दिन बाद नवरियासतीकरण वाले लोग कहेगें कि देश के सरकारी स्कूलों, कालेजों और अस्पतालों से कोई लाभ नहीं है। अत: इनको भी निजी हाथों में दे दिया जाय तो आम जनता का क्या होगा?अगर देश की आम जनता प्राइवेट स्कूलों और हास्पिटलों के लूटतंत्र से संतुष्ट हैं तो रेलवे, बैंकों एवं अन्य सरकारी संस्थाओं को भी निजी हाथों में जाने का स्वागत किया जाए!

देश के लोगों ने बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सरकार बनायी है न कि सरकारी संपत्ति बेचकर मुनाफाखोरों को लाभ दिलाने के लिए, हाँ अगर संस्थानों में प्रबंधन सही प्रकार से कार्य नही कर पा रहा है तो उसमें आमूल-चूल परिवर्तन करने का अधिकार सरकार का है। जहां भी बदलाव करने की आवश्यकता है। सरकार वहां पर तत्काल बदलाव करें ना कि समस्याओं और परिस्थितियों से भागकर संस्थाओं का निजीकरण करे।

क्योंकि कई जगह अक्सर देखने को मिलता है कि एक साजिश के तहत पहले सरकारी संस्थानों को ठीक से काम नही करने दिया जाता है और फिर उसको बीमारू बता कर बदनाम किया जाता है। जिसकी एक बानगी आपने पिछली सरकारों में उड्डयन मंत्रालय के अंतर्गत एयर इंडिया में देख चुके हैं जिसको बहुत अच्छे रुट्स और पीक समय पर टेकऑफ की परमिशन नहीं दी गई। जबकि निज़ी एयरलाइंस को अच्छे रूट्स और अच्छे टाइमिंग दिए गए। वहीं से एयर इंडिया का घाटा शुरू हो गया जो आज तक नहीं समझ पा रहा है। तत्कालीन सरकार के चंद नेताओं और नॉकरशाहों की इस प्रकार की कार्यशैली दर्शाती है कि वह निजी हितों के लिए सरकार के संस्थानों को बर्बाद करने से भी नहीं चूकते।

बहरहाल, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में निजीकरण के मामलों पर अलग-अलग राय और मतभेद हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की संकल्पना की गई है, सैद्धांतिक तौर इन विचारों का निजीकरण की प्रक्रिया से मतभेद है। सार्वजनिक उपक्रमों के अनेक लाभ हैं इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि निजी क्षेत्र की अपेक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के अधिक आर्थिक, सामाजिक लाभ हैं।

दूसरी ओर निजीकरण की प्रक्रिया से बडे़ पैमाने पर प्रबंधन और कार्य-संस्कृति में परिवर्तन से कर्मचारियों मैं असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। इस प्रकार की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि निजीकरण के पश्चात् कंपनियों की विशुद्ध परिसंपत्ति का प्रयोग सार्वजनिक कार्यों और जनसामान्य के लिये किया जा सकेगा? कार्यकुशलता औद्योगिक क्षेत्र की समस्याओं का एकमात्र उपाय निजीकरण नहीं है। उसके लिये तो समुचित आर्थिक वातावरण और कार्य संस्कृति में आमूल-चूल परिवर्तन होना आवश्यक है। भारत में निजीकरण को अर्थव्यवस्था की वर्तमान सभी समस्याओं को एकमात्र उपाय नहीं माना जा सकता। निजीकरण का प्रयोग राजस्व घाटे से निपटने की बजाय संरचनात्मक सुधार हेतु किया जाना चाहिये।

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे व्यापार युद्ध और संरक्षणवादी नीतियों के कारण सरकार के नियंत्रण के अभाव में भारतीय अर्थव्यवस्था पर इनके कुप्रभावों को सीमित कर पाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। निजीकरण के पश्चात् कंपनियों का तेज़ी से अंतर्राष्ट्रीयकरण होना और उनके दुष्प्रभावों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। निजीकरण से जुड़े मुद्दों का समग्र विश्लेषण करने की तत्काल आवश्यकता है।

® चौधरी अफ़ज़ल नदीम