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ज़ाकिर नायक के बहाने …

ज़ाकिर नायक के बहाने …

अशरपफ अस्थानवी

पीस टी वी पर नज़र आनेवाले तेज़तर्रार वक्ता, अपनी बात और तर्क को अन्य ध्र्मग्रंथों केे उद्ध्ृत अंश के आलोक में प्रमाणित करनेवाले इस्लामिक विद्वान डाॅ॰ ज़ाकिर नायक पंथीय दृष्टिकोण से मेरे आदर्श नहीं रहे हैं। अपनी सेवा लगन, अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में प्रकाशित उनके ग्रंथ सर्वत्रा उपलब्ध् हैं। पंथ, दर्शन, ध्र्म से परे जाकर शताध्कि नर-नारी ने इस्लाम को सराहा और कलमा पढ़कर उनके साथ हो लिएऋ यह सब कोई ढंकी-छिपी बात नहीं है, जो भी बात है सार्वजनिक है।
मानव की एक सामान्य प्रवृत्ति है। वह यश-की£त्त-प्रसि(ि तो स्वयं रखना चाहता है, परंतु हानि, अपयश, बदनामी को दूसरों पर थोपना चाहता है। आज पूरे संसार के लिए आतंकवाद एक समस्या है। इस कलंक को किसके सिर थोपा जाए, वह सिर खोजा जा रहा है। ऐसे समय में ज़ाकिर नायक का नाम किसी आतंकी से जुड़ गया, जिसने स्वयं को उनके दर्शन से प्रभावित बताया है। इसका यह अर्थ हमें नहीं निकालना चाहिए कि वह आतंक नि£मत करनेवाले एक संयंत्रा का काम कर रहे हैं। जाँच एजेंसी और पुलिस को उसका काम करने दीजिए। आवेश में बह कर कुछ ऐसी बात नहीं कह दीजिए कि लोग दिग्भ्रमित हो जाएँ और मूल आतंकी आक़ा बच जाए। मिडिया यह तय न करे कि कौन आतंकी है कौन नहीं यह काम न्यायालय को करने दीजिए ।
इस समय ज़ाकिर नायक के प्रशंकों की संख्या पूरे विश्व में दो करोड़ से अध्कि है। रमज़ान के पवित्रा महीने में पवित्रातम मस्जिद-ए-मुनव्वरा ;मदीनाद्ध, जिसमें किसी भी जीव की हत्या व£जत हैऋ उस मस्जिद में रोज़ेदार, इबादतगुज़ारों पर आतंकी हमला, बंग्लादेश में पहली जुलाई को आतंकी हमला, करबला इराक में 9 जुलाई को आतंकी हमले ने पूरी दुनिया के लोगों में आतंकवाद के विरू( आक्रोश और मृतकों के लिए दुःख प्रकट किए जा रहे हैं। ठीक इसी समय जब पूरी दुनियां आतंक को समूल नष्ट करने की इच्छा लिए हुए है, ज़ाकिर नायक को बलि का बकरा बना देना उचित नहीं है।
जाँच एजेेंसियों को उनका काम करने दीजिए। इस समय संघीय शक्तियाँ जिनका नपफ़रत का कारोबार करने का पुराना तजुर्बा रहा है पूरा मौक़ा मिल रहा है। एक-एक कर इस्लामिक बु(िजीवियों को आतंकी बताकर, रहमत-उल्लिल-आलमीन के लाए दीन-ए-इस्लाम का आतंक का पयार्य बनाने की विदेशी और संघीय शक्ति का यह हर्बा काम कर जाएगा ?
कोई भी बयान देने से पहले सोंचे की कहीं आप किसी षड़यंत्रा का शिकार तो नहीं बन रहे हैं? उर्दू समाचार पत्रा दैनिक इंकालब के संपादक शकील शम्सी ने नकारात्मक पत्राकारिता का कार्य किया है। और निरंतर कर कुछ हिंदी समाचार पत्रा और इलेक्ट्रोनिक चैनेल तो संघीय शक्तियों के इशारे पर कार्य कर रहा है, ऐसे में अगर उर्दू पत्रा भी उसी धरा में बह जाएगा तो, कौन बचाएगा उन निरीह लोगों को जो हमेशा से हिंसा और आतंक का शिकार हो रही हैं। क्या किसी ने सांेचा है कि आतंकवादी प्रत्येक कार्रवाई में 90» शिकार भी मुस्लिम हो रहे हैं।
इस्लामिक विद्वान और विचारकों के विरू( हो रही कार्रवाई के प्रति हमें सचेत रहना होगा और शकील शम्सी सरीखे पत्राकारों पर भी नज़र रखना होगा । इस्लाम विरोध्ी शक्ति के विरू( पंथीय विविध्ता को भुला कर कलमा-ए-वहदत की बुनियाद पर एकजुटता दिखानी होगी एवं संगठित होरक कार्य करना होगा ।
एक हो जाएँ तो बन सकते हैं, खुर्शीद-ए-मुबीं,
वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या बात बनें ।।