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नहीं तेरा नशेमन …. बाज़ (शाहीन) से मुस्लिम युवक ग्रहण करें जीने की प्रक्रिया

नहीं तेरा नशेमन ….  बाज़ (शाहीन) से मुस्लिम युवक ग्रहण करें जीने की प्रक्रिया

 

अशरफ अस्थानवी

बाज लगभग 70 सालों तक जीता है, लेकिन अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के 3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं, पंजे लंबे और लचीले हो जाते हैं तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं, चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन में व्यवधन उत्पन्न करने लगती है। पंख भारी हो जाते हैं और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुलनहीं पाते हैं, जो उड़ान को सीमित कर देते हैं।

भोजन ढूंढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाना, ये तीनों प्रक्रियाएं अपनी धर खोन लगती हैं। उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं। पहला देह त्याग दे। दूसरा, अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्याक्त भोजन पर निर्वाह करें, या फिर तीसरा स्वयं को पुर्नस्थापित करे।

जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, वहीं अंत में बचता है तीसरा लंबा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता। बाज चुनता है तीसरा रास्ता… और स्वयं को फिर से स्थापित करता है। वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है। एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब स्वयं को फिर से स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है। सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार-मार कर तोड़ देता है। चोंच तोड़ने से अध्कि पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिए और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का। नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता है पंखों के पुनः उग आने का । 150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी। इसके बाद वह 30 साल और जीता है, वही उर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ। इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं हम इंसानों में भी। हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ानें भरनी होंगी । तभी तो राष्ट्र कवी अल्लामा इक़बाल बाज़ (शाहीन ) से बहुत प्रभावित थे और शाहीन की प्रमुख विषेशताओं के कारण मानव समाज को प्रेरित करते हुए कहते हैं :

नहीं तेरा नशेमन कसरे सुल्तानी के गुम्बद पर

तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों में