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गौ माता, महंगाई मौसी , सियासत कैसी?

गौ माता, महंगाई मौसी , सियासत कैसी?

डॉक्टर ज़ैन शम्सी
सोच रहा था कि सूदी निज़ाम और मोदी निज़ाम में अंतर और समानता का विश्लेषण करते हुए एक लेख लिखूं, यह लिखूं कि सूदी निज़ाम में सूद खोरों की चांदी थी और मोदी निज़ाम में मुफ्त खोरों का सोना है, लेकिन बात इससे भी गहरी है और गंभीर विषय यूं ही बर्बाद करना ठीक नहीं है कि समाज जो अब तक ब्याज प्रणाली से जकड़ा हुआ था कैसे मोदी प्रणाली की पकड़ में आ गया है। लेख शुरू ही करने वाला था कि आदेश हुआ कि बाजार जाएं और मुर्गे के अलावा जो सब्जी चाहें ले आएं, पैसे मैं ने झोले में रख दिए हैं। गृह मंत्री का फरमान था और उनकी अवज्ञा गृहयुद्ध का ढोल पीटती है और वैसे भी जब से मोदी जी ने महंगाई बढ़ाई है, घर की महिलाओं का ब्लड प्रेशर भी बढ़ा है, वह मोदी को कम और पतियों को अधिक कोसने लगी हैं कि आमदनी बढाओ वरना हम भी सारा माल लेकर माल्या हो जाएंगे और तुम एन डी टी वी की तरह चिल्लाते रह जाना , कोई नहीं सुनेगा। सो आदेश टालने का साहस नहीं कर सका और बाजार के लिए निकल गया। सब्जी मंडी में हर तरफ महंगाई बिक रही थी, जिसे भ्रष्टाचार के तराजू में तौलकर बेईमानी की पॉलिथीन में रखा जा रहा था। एक समय था जब सब्जी की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखता था कि क्या सब्ज़ी मनुष्यों के खाने की चीज़ है। घास फूस तो जानवर खाया करते हैं, लेकिन जब से जानवर देखने की चीज़ हो गए हैं और घर की दाल मुर्गे से कई गुना महंगी हो गई , अरहर की खिचड़ी, पीएमओ की कचहरी तक हिलाने लगी, तब से सब्जियों को ही चरना पड़ रहा है। कई सब्जियों के हुस्न देख, छू कर महसूस कर, सुंघ कर देर तक मज़ा लेता रहा, कीमतें पूछता रहा और खरीदने की हिम्मत जुटाता रहा। सब्जी बेचने वाले भी ग्राहकों की औक़ात से परिचित हैं, कीमतें पौ में ही बताते हैं, किलो का बटखरा नहीं रखते, कभी जरूरत पड़ गई तो जिस ईंट पर बैठे रहते हैं, उसी से तोल देते हैं। महंगाई जिस तरह बढ़ रही है, एक दिन ऐसा भी आएगा जब चावल भी दर्जन के हिसाब से मिलेंगे और साग लेना हो तो कहना होगा, तीन पता दे दो। बच्चे अपनी माँ से कहेंगे, अम्मा मैं दुकान में दूध देखकर आया हूँ, बस रोटी दे दो, पेट भर जायेगा।
बेहद बहादुरी का कदम उठाते हुए सब्जी खरीदी, झोले से पैसे निकाले और सब्जी जेब में रखकर आगे बढ़ा। कुछ कदम दूर ही निकला था कि पीछे से आवाज आई। अमा मियां, बधाई हो सैलरी मिल गई है क्या , सब्जी मंडी की ज़ियारत कर रहे हो। पलट कर देखा तो हाजी हुज्जत ख़रामाँ ख़रामाँ चले आ रहे हैं। उनके पास आते ही मैंने शिकायत की,मियां हाजी, संघ की इफ्तार पार्टी के बाद से ऐसे गायब हुए कि कितने गधों के सिर पर सींग उग आये मगर तुम नहीं उगे। हालांकि मुझे उर्दू अखबार के स्रोतों की तरह अपुष्ट सूत्रों से खबर मिल चुकी थी कि वह जब से हलाला कमिटी के अध्यक्ष बने हैं, घरों को तोड़ कर फिर जोड़कर खूब पैसा कमा रहे हैं। उन्होंने सबसे पहला सवाल यही किया कि अमा यह बताओ, सरकार समान नागरिक संहिता लागू कर रही है क्या? मैंने कहा, देखो अभी तो वह गाय और गाली में फंसी हुई है, लेकिन यूपी चुनाव से पहले हो सकता है कि कुछ प्रगति हो जाए। हाजी का मुंह लटक गया। मैं समझ गया कि समान नागरिक संहिता से तलाक का सीधा रिश्ता है और तलाक़ का सीधा रिश्ता हलाला कमिटी से है। सरकार के फैसले पर ही हाजी हुज्जत के भाग्य का फैसला होना है।
हाजी आहत हुए, बात बदल दी, कहा और सुनाओ बाल बच्चे कैसे हैं? मैंने कहा बेगम हमद , नात पढ़ा करती थीं, लेकिन जब से महंगाई ने फन उठाया है, वही पुराना गाना गुनगुनाती हैं।
सखी सैंया तो खूब ही कमात है
महंगाई डायन …. खाए जात है
और बच्ची अब्जद सीख रही है, लेकिन शब्द दाल आते ही रुक जाती है, इससे आगे बढ़ ही नहीं पाती। मुझे लगता है कि उसे भी इस बात का एहसास हो गया है कि यह बहुत महंगा शब्द है, इसे याद रखने से अच्छा भूल जाना ही है। इस्मत चुगताई को लफ्ज़ जिम से चिढ़ थी, उन्हों ने ‘टेढ़ी लकीर ‘ में लिखा है कि जैसे ही मैं इस लफ्ज़ पर पहुँचती, मुझे महतरानी का फूला हुआ पेट याद आ जाता और मुझे उबकाई आने लगती। आज कल बच्चे लफ्ज़ ‘दाल ‘पर अटकने लगे हैं, उन्हें गरीबी का गंभीर अहसास होने लगा है। अफ़सोस अब वह दाल रोटी भी नहीं खा सकते कि प्रभु के गुण गा सकें।
हाजी हँसे और हंसते हुए बोले, भाभी को समझा देना अब महंगाई डायन नहीं है, डायन वह मनमोहन सरकार में थी, अब मोदी सरकार में यह घर में बिन बुलाई आई मूसा की तरह हो गई है, उसके स्वागत के लिए भ्रष्ट हो जाएं या फिर उसे भगाने के लिए बदअख़लाक़ हो जाएं। प्राइम टाइम में, सड़कों पर बैठक में और यहां तक कि संसद में महंगाई पर पूरे दिन हंगामा के बाद सरकार केवल एक वाक्य बोल देती है कि यह महंगाई का मौसम है। बारिश नहीं होती, सूखा पड़ जाता है, ऐसे में सरकार क्या करे, सरकार मेघ तो नहीं बरसा सकती ना। बस बहस खत्म, मानो महंगाई अब कोई मुद्दा नहीं है, अगर मुद्दा है तो हमारे और तुम्हारे लिए, या हम जैसे लोगों के लिए, अब वह समय गया कि टमाटर खान कुर्सियों हिला दिया करते थे और प्याज बेगम सल्तनतें मिटा दिया करती थीं, अब मोर्चा गायों ने संभाला है। वह दूध के साथ वोट भी दे रही है, और यह भी समझ लो कि मोदी सरकार कोई महंगाई, रोजगार या भरष्टाचार रोकने नहीं आई है, वे अच्छे दिन लाने के लिए आई है। बस एक बार अमेरिका पट जाए, तो देखना, इम्पोर्टेड दाल और सब्जियों से तुम्हारा घर और 15 लाख से तुम्हारा बैंक खाता न भर जाए तो कहना। सरकार देश के विकास के लिए अमेरिका को पटाने का काम कर रही है। गवर्नमेंट ऐट वर्क! कमबख़्त पाकिस्तान बीच में न होता तो अब तक ओबामा मोदी का उतारा हुआ सूट पहन चुके होते। यह पाकिस्तान ही है, जो भारत का भाव गिरा देता है।
हाजी की बातों में दम था, वास्तव में अब महंगाई राजनीति का मुद्दा नहीं बल्कि समाज का मुद्दा बन गयी है और समाज के मुद्दे से नेताओं का कोई लेना देना नहीं होता, वह समाज के उसी मुद्दे को छूते हैं, जो वोट के लिए ज़रूरी होता है। अब महंगाई नहीं गाय मुद्दा है और चूंकि गाय अब दूध की जगह वोट देने लगी है, इसलिए सभी नेताओं के लिए वह पूजनीय भी हो गई है। शोमई किस्मत कि जो गाय की रक्षा करते हैं वे भय में हैं,और जो गाय की राजनीति करते हैं वे मौज में हैं। पहले गाय का उपयोग दुग्ध उद्योग के लिए होता था, अब उस का इस्तेमाल नफरत उद्योग स्थापित करने में कर दिया गया है। गौ रक्षा और गौ सेवा के नाम पर जगह जगह चंदा वसूली और कहीं कहीं जबरन वसूली का धन्दा जोरों पर है।
हाजी हुज्जत भी मेरी चिंता को समझ रहे थे, उन्होंने कहा बताओ मेरे एक मित्र हैं, दूध का कारोबार करते हैं, यही हरियाणा से एक भैंस लेकर आ रहे थे, रास्ते में बजरंगियों ने घेर लिया। लाख कहा यह काली भैंस है, दिखाई नहीं देती है तुम लोगों को। बजरंगी गुंडे बोले, मुसलमानों का क्या भरोसा गाय को काले रंग से रंग कर ले जा रहे होगे, तो उसने चाकू से भैंस के चमड़े को छील दिया, जब खून बहने लगा तब उसे बहुत दुख हुआ कि काश ये गाय निकलती तो आज एक मुसल्ले को तसल्ली से भरपेट मारता , वीडियो बनाता और पीएमओ में भेज देता ताकि कोई पद मिल जाए। ऐसे में क्या कोई इस कारोबार में हाथ डालेगा। मंदसौर में भैंस का मांस ले जाने वाली दो मुस्लिम महिलाओं को पीटा और प्रशंसा हासिल की, लेकिन जब गुजरात में दलितों ने मोर्चा खोल दिया है। मरी हुई गाय बदबू देने लगीं, तब कुछ संभले हैं और गाय को छोड़कर मायावती से उलझे हैं। मायावती को गाली दी गई, गुजरात में दलितों को पीटा गया है। दलित मुसलमान नहीं हैं जो हायतौबा न मचाएं। मामला फंस गया है। अब सरकार को दो में से एक को चुनना होगा। गाय चाहिए या दलित। गाय वोट का स्रोत हो सकती है, लेकिन वह ईवीएम मशीन का बटन नहीं दबा सकती है। इसलिए देख लेना दलितों को पटाने के लिए एक बार फिर गाय को भूल जाएंगे। सरकार किस लिए आई थी और क्या करने लगी। विकास के नाम पर किस चीज का विकास हो रहा है। कैसे मानसिकता बदली जा रही है । पिछले दो सालों में देश की जनता ने क्या नहीं देखा, और अब तो जनता यह फैसला नहीं कर पा रही हैं कि सरकार कौन चला रहा है। भाजपा या आरएसएस? या गली के गुंडे? प्रत्येक मुद्दे को हिंदू -मसलमान, दलित-ब्राह्मण के चश्मे से देखा जाने लगा हे इन्साफ की प्रक्रिया कच्ची हो चुका, पहले से ही तय हो जाता है कि किस मामले का फैसला किसके पक्ष में होगा। पुलिस, नौकरशाह, मीडिया सब चापलूसी में लग गए हैं। समाज तिनकों की तरह बिखर रहा है और शीर्ष नेतृत्व मूकदर्शक है, मानो जो कुछ भी हो रहा है, उसी के स्वभाव के अनुसार हो रहा है।
घर वापसी पर सोच रहा था कि हाजी हुज्जत जैसा मस्त मॉल चरित्र भी अब गंभीर होने लगा हैं। यह खुले समाज की सबसे बड़ी हार है। नहीं में हाजी हुज्जत को गंभीर नहीं होने दूंगा। मैं हार नहीं मानूंगा। मुझे विश्वास है कि एक दिन ऐसा आएगा जब भारत के शांतिप्रिये लोग प्यार की पैलेट गन निकालेंगे और नफरत, कट्टरता, बेईमानी, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, नस्लवाद, जातिवाद , और सामंती शासन की आँखें फोड़ देंगे।