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गरीबी के कंधे पर सिस्टम की लाश

गरीबी के कंधे पर सिस्टम की लाश

डॉ.ज़ैन शम्सी
अक्सर अखबार की हेडलाइन्स बनाते समय बदमाशियां करता रहता हूँ । किसी बात को सीधे कह दिया तो क्या कहा , इसमें नमक मिर्च लगा दो तो मज़ा बढ़ जाता है। कभी सीधा सादा शीर्षक लगाया तो हॉट सीट पर बैठे डिजाइनर सलाम खान घूरते हैं, आज मज़ा नहीं आया, कुछ किजिये । इन से छुटे तो राशिद खान और अता बनारसी का मुंह बन जाता है कि आज वह बात नहीं है, शम्सी भाई, उनसे भी बच गया तो मुख्य संपादक क़ासिम सैयद साहब कह देते हैं, लगता है आज आपका मूड ठीक नहीं था? मगर आज सब चुप थे, क्या सुर्खियां बनाता, एक व्यक्ति अपनी मरी हुई पत्नी को चटाई में लपेटकर 6 घंटे तक अपने कंधे पर लादे रात के अंधेरे में अस्पताल से अपने 60 किलोमीटर दूर घर के लिए निकलता है और 10 किलोमीटर तक सड़क पर यूं ही हांफते कांपते दौड़ता चला जाता है और साथ में दौड़ती रहती है मरी हुई औरत और एक गरीब ,निराश, मजबूर, व्यवस्था से हारे हुए पिता की दस साल की बेटी। अपने पिता के कंधे पर अपनी मां की लाश को देखती हुई बच्ची के दर्द का क्या शीर्षक हो सकता था। ‘मानवता की मौत’, सड़े गले व्यवस्था का शव, ‘और मानवता मर गयी ‘ ‘मुर्दे हँसते रह गए इंसान मर गया ‘। एक हजार शीर्षक लगा सकता था, लेकिन आंखों में आंसू थे, दिल में दर्द का तूफान था। रुंधे गले से बस यही निकला ‘पत्नी नहीं खत्म होती मानवता और सड़े सिस्टम का शव लेकर 10 किलोमीटर तक सड़क पर दौड़ता रहा मांझी ‘ और इस शीर्षक पर किसी ने कलम नहीं चलाया, क्योंकि सभी के दिलों में करुणा और मानवता का लहुलहान खंजर पहले से चल रहा था।
कहते हैं कि पत्रकार बेहिस तबीयत के होते है, दो सौ लोग मर जाते हैं तो उसके चेहरे पर अनोखी मुस्कान दौड़ जाती है कि चलो आज की बड़ी खबर मिल गई। कभी मौतों की संख्या कम हुई तो मायूसी के साथ कहते हैं, बस 4 ही लोग मरे, कहीं एक कालम में अंदर के पृष्ठ पर ले लो, इराक और सीरिया में मरने वाली खबर को हम लोग अब यही कहते हैं कि जिस दिन कोई न मरे, तब खबर है। अब तो वहां मौत ही जनजीवन है, वह अब खबर कहां? मगर दाना मांझी के कंधे पर रखी लाश हंसते हुए पूछती है, अब क्या करोगे, अंदर के पृष्ठ पर कहीं डाल दो। लिख दो कि उमाँग देई का पति शराब पी कर अस्पताल से भाग गया। जांच बैठा दो कि अस्पताल ने पूरी कोशिश की, लेकिन मांझी चुपके से पत्नी का शव लेकर फरार हो गया, देखती हूँ, क्या करते हो। कभी गरीबों की खबर ली, कभी हम , आदिवासियों के जीवन में झांका। कभी दलितों का रोना सुना। आज मैं मरी हूँ तो सारे टीवी चैनल पर मेरा पति दौड़ता हुआ दिख रहा है। सब मानवता मर जाने का रोना रो रहे हैं। ऐसी कई महिलाएं मरी हैं, कई बच्चे बे गोर व कफन जानवर और पक्षी का निवाले बने हैं। हमारे मर्द यूं ही भाग रहे हैं, कभी पत्नी का शव कंधे पर रखकर, कभी बुखार में तपते अपने लख़्ते जिगर को लेकर , कभी लहूलुहान बेटियों को गोद में उठाये, कभी निराशा, बेरोजगारी, गरीबी का जनाज़ा लिए दौड़ते ही रहते हैं, भागते रहते हैं, लेकिन तुम लोगों को चाहिए चाट पटी खबरें। दमदार खबरें , दुमदार खबरें । पाकिस्तान पर बयानबाजी, गाय पर बयानबाजी, राष्ट्र पर बयानबाजी, तिरंगे पर बयानबाजी, देख लेना कभी ऐसा न हो जाए कि एक दिन बयानबाज़ी ही उठ कर तुम लोगों के सामने आ खड़ा हो और पूछ ले क्या बक रहे थे तुम और एक दिन राष्ट्रीयता का भूत तुम्हारे ऐसी कमरे में आकर बैठ जाए कि बताओ अब तक तुमने क्या किया। तब देते रहना जवाब। मैं तो चली। मुझे इस दुनिया से मुक्ति मिल गई। तुम आबाद रहो, खुश रहो।
रवीश कुमार ने टीवी पर बोला कि गरीबी के पास व्यवस्था और समाज को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए मौत के अलावा कुछ नहीं होता मगर व्यवस्था को कितनी लाश चाहिए, उसे कितनी जानें चाहिए। जिस तरह मानवता की मौत का उल्लेख आज हुआ या हो रहा है क्या यह पहली मौत है, यह प्रशासन और व्यवस्था की पहली लापरवाही है, क्या इससे पहले सब कुछ ठीक था।
सच तो यह है कि सरकारी अस्पताल मरीजों को और खासकर गरीब मरीजों को कब्रिस्तान से नहीं कब्रिस्तान में खींच लाता है । याद कीजिए गुड़गांव की घटना सरकारी सिविल अस्पताल में 11 साल की नेहा तीन घंटे तक लाइन में खड़ी रही, माँ पानी लाने गई। इस बीच नेहा बेहोश हो गई। उसे मृत घोषित कर दिया गया। उत्तर प्रदेश के बहराइच में मुफ्त इलाज का सिस्टम होने के बावजूद रिश्वत न देने के कारण कृष्णा मर गया। इंजेक्शन लगाने के लिए कर्मचारी ने बीस रुपये मांगे जो उसकी माँ के पास नहीं थे। आगरा के एक अस्पताल की घटना याद कीजिए। जब पूनम का टी बी का इलाज नहीं हुआ, उसे भगा दिया गया, पूनम अस्पताल से बाहर आई, दो किलोमीटर ही चल पाई थी कि उसके शरीर ने जवाब दे दिया। फिर जब लोग जमा हो गए तो फुटपाथ पर ही उसका इलाज हुआ। इन सब घटनाओं ने हमें और आपको आहत किया है और इन सब घटनाओं में या तो निचले स्तर का कोई कर्मचारी निलंबित हुआ है या फिर किसी छोटे डॉक्टर को नौकरी से निकाल दिया गया या तो जांच के मकड़जाल में फाइलें गुम कर दी गयी हैं। हमारा सिस्टम हम से हमेशा आगे रहा है। हम एक को मरते देखते हैं वह कई को मार चुका होता है।
स्वास्थ्य विभाग को धंधा बना दिया गया है। किडनी चोरी, ब्लड बैंक घोटाला , महंगी दवायों की हेरा फेरी , अस्पतालों में भर्ती के लिए दलालों से संपर्क, मरीजों की भीड़ में एक या दो डॉक्टरों की सुविधा। कई रोगी तो बस इसलिए मर जाते हैं कि जब उनके आपरेशन का समय आता है डॉक्टर छुट्टी पर चले जाते हैं। डॉक्टर मरीजों को अपने घर बुलाकर इलाज करवाने के लिए मजबूर करते हैं। चिकित्सा विज्ञान के विकास के नाम पर आज तक जो भी हुआ है, आप खुद सोचिए इस विकास में गरीबों का कहीं कोई हिस्सा है, कहीं कोई फायदा है। जीवन रक्षक दवाईयां इतनी महंगी हो गईं कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के लिए वह अमृत हो गई हैं। नर्सिंग विभाग भी इतना व्यावसायिक हो गया कि जितनी सैलरी इतना काम करने वाली नर्सों की भीड़ हो गयी और मशीनरी द्वारा प्रशिक्षित मानवता का जुनून रखने वाली नर्सों को नौकरी नहीं मिल पा रही है कि वह ईसाई धर्म का प्रचार कर देती हैं। मानो खुद से काम नहीं होता और दूसरों की मानवता को धर्म परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा हे। बाज़ार में दुकानों के जंगल में केवल मेडिकल स्टोर ही है जहां उधार नहीं चल पाता। मरीज चाहे कितना भी सीरियस हो दवाईयां पैसे देकर ही प्राप्त की जा सकती हैं। छोटे शहरों की डिस्पेंसरी में महंगी दवाओं को बेच दिया जाता है। मरीजों से कहा जाता है कि वे बाजार से दवा खरीदें। ऐसे में एम्बुलेंस सेवा को जितना कोसना हो कोसिये।
डॉक्टर को पृथ्वी पर भगवान का दर्जा दिया जाता है, लेकिन अब वह इस ओहदे के लिए सक्षम नहीं हैं , दरअसल अब डॉक्टरी पेशा मलाईदार व्यापार का रूप ले चुका है। किसी भी डॉक्टर के पास जाएँ, वह बिना आप को हाथ लगाए 10 तरह के टेस्ट लिख कर देगा, साथ ही यह भी बताएगा कि यह टेस्ट कहाँ कराना है, ताकि कमीशन उसकी जेब में आ जाए। मामूली खांसी और बुखार बिना टेस्ट सही नहीं हो सकते। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास की बात करने वाले यह सुन कर हंस देते हैं की गांव का मामूली वैद्य या तबीब नब्ज पर हाथ रखकर कह दिया करते थे कि कौन सी बीमारी है और इसका इलाज किया है। वे अधिक विकसित मेडिकल स्पेशलिस्ट थे या आज अपोलो में बैठे अमेरिका रिटर्न डॉक्टर जिसे किसी भी रोग के निदान के लिए 10 टेस्ट रिपोर्ट चाहिए।
दरअसल मानवता , सभ्यता और नैतिकता की अब इस दौलत परस्त दुनिया में कोई जगह नहीं रह गई। गौरक्षक द्वारा बेदर्दी से पिटाई की कई हिंसक वीडियो हम रोज देखते हैं। सरे बाज़ार डंडों और छुरों से लोगों को मार दिया जाता है। सड़कों पर लाशें चीखती रहती हैं और राहगीर गुजरते रहते हैं। मदद की चीखें फज़ाएँ को चीरती हुई ख़लाओं में खो जाती हैं। जीवन के तमाम विभाग में अब गरीबी और मजबूरी सिसकती हुई नज़र आती है, चिकित्सा विभाग इससे अलग कैसे हो सकता है। चूंकि गरीबी खुद एक अपराध है, इसलिए इस पर केवल रोया जा सकता है। गरीबी पर रोईए या गरीबों पर रोईए मगर इस रोने का समाधान खोजने में अपना कीमती समय मत बर्बाद किजिए , आदमी की मजबूरी पर आंसू निकल सकते हैं, मगर तब क्या कीजिएगा जब मानवता ही क़ब्र में लेटी हो। बस अपनी अपनी सलीबें अपने कंधों पर उठाकर तयार रहिये कि अब आप की बारी आने वाली है।
Zain Shamsi