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एक और ग़ुलाम सरवर की ज़रूरत

एक और ग़ुलाम सरवर की ज़रूरत

स्टार न्यूज़ टुडे के विशिष्ट संपादक अशरफ अस्थान्वी

जिसको कहते हैं गुलाम सरवर ष् हाँ बहुत आनबान वाला था । वो उक़ाबी निगाह रखता था ष् इनक़लाबी ज़बानवाला था ।।
गुलाम सरवर बिहार के ऐसे महान व्यक्ति का नाम है जिसने अपने आचरण और व्यवहार से यह सिद्ध किया की वे उन लोगों में से नहीं हैं जो युग से प्रभावित होते हैं बल्कि इनका संबंध् उन लोगों से हैं जो युग को प्रभावित करते हैं और युग पुरुष कहलाते हैं। उन्होंने एक निर्भीक पत्राकारए प्रखर वक्ता निरस्वार्थ समाज सेवी के अतिरिक्त सफल एवं अनुकरणीय राजनेता के साथ साथ उर्दू के नायक तथा उर्दू को स्थापित करने के लिए एक योद्धा की भूमिका निभाई और अपनी क्षमता का लोहा मनवाया और एक नए युग के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।
गुलाम सरवर एक संपन्न घराने से संपर्क रखनेवाले उच्च शिक्षा प्राप्त शिक्षित व्यक्ति थेए उनके लिए व्यवसास के अन्यस्रोतों को अपनाना सरल था परंतु इन्होंने कठिन मार्ग का चयन किया। कठिनाईयों से सामना करने की यही प्रवृत्ति व्यक्ति को महान बनाती है। उन्होंने उर्दू पत्राकारिता को आत्मसात कर लिया जो उस समयए आज के समान लाभप्रद नहीं थी। विशेषकर उन परिस्थियों मेंए जिसमें समाचार पत्र का संपादक या स्वामी अपने आदर्श से समझौता करने के लिए तैयार न होए यह बहुत घाटे का सौदा होता है। एक अवसर पर उन्होंने स्वयं कहा था कि पत्राकारिता की कांटेदार वादियों में अपना सबकुछ लुटा बैठा हूँ। इसलिए इस मार्ग पर अग्रसर होने का उपदेश मैं किसी को नहीं देता हूँ बल्कि उन्हें रोकता हूँ। मैं तो जान चुका हूँ कि प्रीत करके दुःख होता है। इसलिए ढिंढोरा पीटकर कहता हूँए ष्ष्प्रीत न करियो कोईष्ष् ।
गुलाम सरवर दानापुर कंटोनमेंट बोर्ड से विधान सभा की सदस्यता ग्रहण करने तथा बिहार विधान सभा के अध्यक्ष पद पर आसीन होने के अतिरिक्त शिक्षा मंत्रालय एवं कृषि मंत्रालय तक की जिम्मेवारी संभाली और जहाँ भी रहे अपनी पगड़ी की लाज बचाए रखा। लेकिन वे स्वयं को अंतिम दिनों तक पत्रकार ही स्वीकार करते रहे । उनका कहना था कि उनका मूल व्यवसाय पत्राकारिता ही है।
लेकिन मैं समझता हूँ कि उन्होंने हर जगह और अपनी हर स्तर पर समाजसेवा के महान कर्तव्य का निर्वाह किया है और समाज सेवा को ही अपना आदर्श बनाया है। फिर चाहे पत्राकारिता हो या राजनीति उन्होंने समाजसेवा का सिलसिला जारी रखा। दानापुर कोंटेनमेंट के लिए जिस वार्ड से वह निर्वाचित हुए उस वार्ड में अध्किांश अभावग्रस्त एवं नीची जाति के लोग थे जो पहले से ही उपेक्षित थे। निर्वाचित होने के बाद सर्वप्रथम उन्होंने सड़कए बिजलीए पानीए नाला और स्कूल की ओर उन्मुख हुए। अंजुमन तरक्क़ी.ए.उर्दू बिहार के महामंत्राीए बिहार राज्य अंजुमन तरक्क़ी.ए.उर्दू के प्रमुखए उर्दू दैनिक साथी और उर्दू दैनिक संगम के संस्थापकए स्वामी एवं संपादक की हैसियत से उर्दू के हित में हस्ताक्षर अभिमान चलाया और ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी कि वर्ष 1967 में पहली बार बिहार से तथा वर्ष 1977 में पहली बार देश से कांग्रेस राज का सफाया हो गया । वर्ष 1967 के विधान सभा चुनाव में गुलाम सरवर ने जो अपने अच्छे कर्मों के कारण आज भी जीवित हैंए उन्होंने उर्दू को चुनावी मुद्दे से जोड़ते हुए पहली बार कहा कि जो उर्दू हित की बात करेगा अल्पसंख्यकों का मत उसे ही मिलेगा। इस प्रकार उस चिंगारी को शोला बना दिया जो वर्ष 1960 में प्रसिद्ध स्वतंत्राता सेनानी मग़फूर अहमद एजाज़ी ने मुजफ्फरपुर से उर्दू बचाओ सम्मेलन आयोजित कर के उर्दू प्रेमियों के दिलों में भर दी थी। इसके अतिरिक्त कभी वक्फ संरक्षण सम्मेलनए कभी फलस्तिनियों के संरक्षणए कभी बिहारी बचाओ आंदोलनए कभी आल इंडिया उर्दू एडिटर्स कांफेंस तो कभी बिहार राज्य जमीयत.उर.राइन को इस्लामिक दिशा.निर्देश पर डालने के सफल प्रयास ने गुलाम सरवर को एक लोकप्रियए सक्रिय अल्पसंख्यक समुदाय का नेता बना दिया ।
वर्ष 1977 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए तो उन्हें शिक्षामंत्राी बनाया गया। उन्होंने माध्यमिक कक्षा तक निःशुल्क शिक्षाए प्राथमिक कक्षा में निःशुल्क पुस्तकेंए माध्यमिक शिक्षों के सम्मान की रक्षाए संस्कृत और मदरसा की स्थिति में सुधारए स्वतंत्रा बिहार मदरसा शिक्षा बोर्ड की स्थापना तथा सारे अल्पसंख्यक प्राथमिकए माध्यमिकए अल्पसंख्यक शिक्षण.प्रशिक्षण महाविद्यालयों को मान्यता प्रदान कराई। जेलो में बंद बिहारी मुसलमानों की रिहाईए मुकदमें की वापसी और उन्हें प्रताड़ित करने की कार्रवाई को समाप्त कराया। अज़ीमाबाद पब्लिकेशन की स्थापना की और बिहार का पहला उर्दू गल्र्स स्कूलए अयूब उर्दू गल्र्स हाई स्कूल की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
वर्ष 1980 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई तो जनता पार्टी और उसके नेता की गतिविध्यिाँ कम हो गईं। हलांकी गुलाम सरवर ने दैनिक संगम के माध्यम से अपनी सेवा को जारी रखा और समाचार पत्रा में ष्ष्पहला काॅलमष्ष् लिकखर समुदाय के मार्गदर्शन का निर्वाह करते रहे। लेकिन 1980 से 1989 तक का दौर उनके ठहराव का दौर था। इस बीच वे सक्रिय राजनीति से दूर रहे लेकिन जनता दल की स्थापना के बाद वह फिर सक्रिय हो गए और जनता दल ने मुफ्ती मोहम्मद सईद को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का अध्यक्ष बनायाए तो मुफ्ती मोहम्मद सईद ने बिहार की कमान गुलाम सरवार को सौंपी। गुलाम सरवर ने पूरे राज्य का तूफ़ानी भ्रमण किया और उपेक्षित वर्गों और मुसलमानों को जनता दल के समर्थन में ला खड़ा किया।
मैंन भी गुलाम सरवर के साथ अनेक जिलों का भ्रमण किया था और निकट से देखा तथा आभास हो गया था कि बिहार में जनता दल की सरकार बनने से अब कोई रोक नहीं सकता है। वर्ष 1990 में जनता दल की सफलता के साथ इनकी दूसरी पारी की शुरूआत हुई। गुलाम सरवर बिहार विधान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए तो इन्होंने इस पद पर रहते हुए अनेक ऐतिहासिक कार्य किए जिसमें विधान सभा में उर्दू सेल की स्थापना की। यह ऐतिहासिक कारनामा था बाद में प्रो॰ जाबिर हुसैन ने इनका अनुसरण करते हुए बिहार विधान परिषद् में उर्दू सेल स्थापित करके की।
गुलाम सरवर के उर्दू प्रेम को उनके भाषण को उस अंश से समझा जा सकता हैए जिसमें उन्होंने एक अवसर पर कहा था कि ष्ष्मेरा मकान.माल.संपत्ति ले लो मुझे आपत्ति नहीं होगीए मेरे प्राण लेले मुझे आपत्ति नहीं होगी लेकिन उर्दू का अध्किार कोई छीनेगा यह मुझसे सहन नहीं होगा क्योंकि उर्दू मेरी माँ हैए इसे आदर देना ही होगाष्ष् ।
उर्दू का यह योद्धा इस बात से पूर्ण अवगत था कि एक निर्भीक समाचार पत्र के बिना अल्पसंख्यकों में जागृतिए अध्किार की रक्षा के प्रति उत्तरदायित्व एवं समाज के प्रति कर्तव्य का निर्वहन संभव नहीं है इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 10 अक्टूबर 1953 को साप्ताहिक ष्ष्संगमष्ष् निकला जो जो 10 जनवरी 1963 से दैनिक समाचार.पत्रा में परिवर्तित हो गया। दैनिक समाचार.पत्र संगम के माध्यम से गुलाम सरवर समुदाय की भी समस्याओं को स्पष्ट एवं प्रभावशाली ढंग से उठाते रहे । समुदाय को झिंझोड़ते रहे और अध्किार के लिए संघर्ष करने का आह्वान करते रहे। शीघ्र ही ष्ष्संगमष्ष् पूरे समुदाय का लोकप्रिय और विख्यात समाचार.पत्र बन गया। समुदाय इसे अपनी भाषा और अपनी समस्याओं का दर्पण मानकर प्रतिदिन दिवाने की तरह इस पत्र के आने की प्रतीज्ञा करताध्निस्संदेह संगम ने उस युग में जैसी लोकप्रियता और प्रसिद्धि पाई वैसी शायद ही कोई समाचार.पत्र ने प्रसिद्धि पाई हो ।
संगम के संपादकीय सत्ता के विरूद्ध नंगी तलवार के समान हुआ करते थे जिसके कारण संगम समाचार.पत्र पर 34 मुक़दमे दर्ज हुए तथा 6 बार 1964ए 1965ए 1966ए 1968ए 1970 तथा 1971 में जेल की सलाखों के पीछे भेज गए एवं प्रत्येक बार बाइज़्ज़त बरी होते रहे। उन्हें डी आई आर अध्निियम अर्थात डिफेंस आॅफ इंडियन रूल्स के अंतर्गत गिरफ्रतार किया जाता था जिसकी प्रताड़ना के कारण जनता इसे काला कानून कहती थी। उनकी हर गिरफ्रतारी के बाद सरकार को जन आंदोलनों का सामना करना पड़ता और सरकार मजबूर होकर उन्हें छोड़ देती थी।
उनकी प्रमुख कृतियों में मकालात.ए.सरवरए खुतबात.ए.सरवरए जहाँबीनीए अवाम की अदालत मेंए जहाँ हम हैंए पहला वो घर खुदा काए हर्फे अव्वल और हर्फे आखि़र एवं गोशे में क़फ़स के इत्यादि उल्लेखनीय है।
वर्ष 1995 में वे तीसरी बार और वर्ष 2000 में चैथी और आखिरी बार बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए।10 जनवरी 1926 को उदय होने वाला ये सूर्य 17 अक्टूबर 2004 को ईश्वर से जा मिला। अपनी मृत्यु तक वे कृषिमंत्राी के पद पर आसीन रहे। उन्होंने 1998 में जनता दल के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ा ।
गुलाम सरवर आज हमारे बीच नहीं हैए लेकिन उनकी स्मृतियाँए उनकी सेवाएँए उनके योगदानए उनके बलिदानए उनकी रचनाएँ हमारा सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी। आज उर्दू को बिहार की द्वितीय राजभाषा का गौरव प्राप्त है तो इसका श्रेय गुलाम सरवर को ही जाता है। उर्दू आज उपेक्षित हैए इसकी अनिवार्यता समाप्त कर दी गई हैए हज़ारों उर्दू शिक्षकों के पद रिक्त हैं और उर्दू आबादी मौन तथा निश्चित है इसका एकमात्र कारण यही है कि आज कोई गुलाम सरवर नहीं है। इसलिए मुझे यह कहते हुए कोई झिझक नहीं है कि गुलाम सरवर और उनके साथियों के बाद उर्दू का झंडा ऊंचा करने वालाए उर्दू को न्याय दिलानेवाला और इसको सम्मानजनक स्थान प्रदान करानेवाला कोई दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। आशा है कि गुलाम सरवर के प्रशंसकों में से ही कोई उर्दू का योद्धा जरूर जन्म लेगा तथा उर्दू का ध्वज सशक्त कंधें पर उठाए आगे बढ़ेगाए क्योंकि उर्दू और उर्दू आबादी को फिर एक और गुलाम सरवर की जरूरत है।

ब्मससरू 9431221357