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हिन्दुस्तानी आईन और सेकुलिर्ज़म का तहफ़्फ़ुज़

हिन्दुस्तानी आईन और सेकुलिर्ज़म का तहफ़्फ़ुज़

मौलाना हाषिम क़ादरी मिस्बाह़ी
आईने हिन्द में हिन्दुस्तान को ‘‘रियासतों की यूनियन’’ के नाम से मौसूम किया गया है, जिसका मतलब वफ़ाक़ी तर्ज़े हुकूमत है। इस निज़ाम हुकूमत में एक तह़रीरी आईन का होना लाज़िमी है, जिसके ज़रिये मरकज़ी हुकूमत और रियासती हुकूमत के दरमियान इख़्तियारात की तक़सीम अमल में आती है। अ़दलिया को आज़ाद किया गया है, (लेकिन अफ़सोस अब उसमें घुस पैठ की जा रही है) अ़दलिया को आज़ाद रखने का मक़सद इन्फ़िरादी और जम्हूरी उसूलों का तहफ़्फ़ुज़ है, जो मुअ़ाशरे को तमाम लोगों के साथ बराबरी का दर्जा दे, भारत की अदालते उज़मा और रियासती अदालतों को यह इख़्तियार हासिल है कि किसी क़ानून साज़ी या इन्तेज़ामिया की कारवाई को ग़ैर आईनी क़रार दे सकें।
रियासतों के ग़लत फ़ैसलों को दफ़ा 12 और 13 के तहत ग़लत क़रार दे सकें, उसमें बहुत से निकात हैं, आज़ाद हिन्दुस्तान का यह आईन दुनिया के तमाम दस्तूरों में सबसे ज़्यादा ज़ख़ीम है, उसमें दुनिया के बहुत से दस्तूरों के बेहतरीन निकात शामिल हैं। आईने हिन्द में मरकज़ी हुकूमत के साथ ही रियासतों के बुनियादी फ़राइज़, सदर जम्हूरिया के हंगामी इख़्तियारात, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के साथ पब्लिक सर्विस कमीशन, फ़नानस कमैटी, इलैक्शन कमीशन जैसे अहम इदारों की तफ़सीलात की भी वज़ाह़त कर दी गई है।
जब क़ानून नाफ़िज़ किया गया था, तब उसमें 355 दफ़अ़ात और 8 शिडयूल थे, लेकिन उसमें वक़्तन फ़वक़्तन तर्मीमात होते रहते हैं और अब तो मन मानी, बल्कि ज़िद व हट धर्मी से अक्सरियत फ़िरक़ा को ख़ुश करने और अक़लियतों की तज़लील करने के क़वानीन पास किये जा रहे हैं, जो बहुत ही तशवीश नाक और अफ़सोस नाक है। आईने हिन्द के बनाने में जहाँ डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर और बहुत से ज़ी इल्म लोग शामिल थे, वहीं इस मुल्क की आज़ादी के लिये बहुत ज़्यादा कु़र्बानी देने वाले मुसलमान, ख़ासकर उलमा जिन्होंने अपनी जानों की कु़र्बानियाँ दी हैं, वह भी आईने हिन्द के बनाने में बराबर के शरीक थे, जिन्होंने 2 साल 11 महीने और 18 दिन की कड़ी मेहनत के बाद आईने हिन्द को मुरत्तिब किया, जिनमें चन्द नुमायाँ नाम यह हैंः
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, बेरिस्टर आसिफ़ अली, ख़ान अ़ब्दुल गफ़़्फ़ार ख़ान (सरह़दी गांधी) मुह़म्मद सअदुल्लाह, अ़ब्दुर्रह़ीम चैधरी, बेगम ऐजाज़ रसूल और हज़रत मौलाना ह़सरत मोहानी, सभी अराकीन ने उसमें दस्तख़त किये।
असम्बली का इजलास 24 दिसम्बर 1949 ई0 को मुनाक़िद हुआ, जिसमें डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद को इत्तेफ़ाक़ राये से हिन्दुस्तान का पहला सदर जम्हूरिया मुन्तख़ब कर लिया गया और आईने हिन्द को 26 जनवरी 1950 ई0 को नाफ़िज़ कर दिया गया। 26 जनवरी 1950 ई0 को इसी अहद की तजदीद करते हुए हिन्दुस्तान को एक ‘‘मुक़्तदर आला जम्हूरिया’’ में मुन्तक़िल कर दिया गया।
26 जनवरी को यौमे जम्हूरिया के तौर पर हर साल मनाया जाता है। इसी दिन का यह भी पस मन्ज़र है कि 1930 ई0 में लाहौर के मक़ाम पर दरिया-ए-रावी के किनारे इण्डियन नेशनल कांग्रेस ने अपने इजलास में जिसकी सदारत जवाहर लाल नेहरू ने की थी, डोमिनीन स्टेटस के बजाये मुकम्मल आज़ादी के हु़सूल को अपना नसबुल एैन क़रार देकर 26 जनवरी को मुकम्मल आज़ादी के तौर पर मनाने का फ़ैसला किया गया, वाज़ेह रहे कि मुकम्मल आज़ादी का नारा हज़रत मौलाना ह़सरत मोहानी का था, जो कि लन्दन काॅन्फ्रेंस व कई काॅन्फ्ऱंेसों में आपने दिया था, उसकी तफ़सील के लिये तारीख़ का मुताला फ़रमाये।
अफ़सोस कि आज़ादी के 70 सालों के बाद भी हमारे मुल्क का किया ह़ाल है किसी से ढका छुपा नहीं है, हर तरफ अतारकी फैली हुई है, कमज़ोरों का इस्तेह़साल, मंहगाई से हर इन्सान करा रहा है, हुजूमी क़त्ल के ज़रिये बे-कु़सूर लोगों को बे-दर्दी से मौत के घाट उतार दिया जा रहा है, लोग इन्साफ़ के लिये दौड़ दौड़कर परेशान हैं, कराह रहे हैं, मुसलमानों के साथ इम्तियाज़ व तास्सुब की पाॅलिसी अपनाई जा रही है और मुल्क को हिन्दू-मुस्लिम के ख़ानो में बाँटा जा रहा है और पिछड़ी ज़ातो के हु़कू़क़ को भी ख़त्म किया जा रहा है। यह कैसा सैकुलिर्रज़म है? इक़्ितदार में रहने वाले नेता हज़रात काँटों को फूल और मुसीबतों को आराम क़रार दे रहे हैं, लोग दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, जबकि हुक्मराँ ज़राये इबलाग़ में रात दिन ख़्याली जन्नतों और अफ़सानवी ख़ुशह़ाली का ढ़िंडोरा पीट रहे हैं।
हिन्दुस्तानी सैकुलिर्रज़मः हिन्दुस्तान एक ऐसा मुल्क है, जहाँ मुख़्तलिफ़ क़ौम के लोग बसते हैं, जहाँ मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब और अक़ाइद रखने वाले लोग सदियों से हु़ब्बुल वतनी के जज़्बे के साथ रहते, बसते चले आ रहे हैं, इस मुल्क का इत्तेह़ाद, सालमियत, यगानिगत सही मायनों में उस वक़्त क़ायम रह सकती है, जब यहाँ हक़ीक़ी मायनों में वफ़ाक़ी निज़ाम क़ायम हो, तमाम मज़ाहिब और अक़ाइद व अफ़कार को तहफ़्फु़ज़ हासिल हो, हर नस्ल और ज़बान व सक़ाफत के फैलने फूलने की राहें हमवार हों, लेकिन अफ़सोस कि आज अकल्लितों, ख़ास कर मुसलमानों व दीगर अक़ल्लियतों के मज़हबी, इन्सानी हुक़ूक़ पामाल करके अमलन अक्सरियत फ़िरके़ लोगों को ख़ुश करने के लिये निज़ामे हुकूमत चलाया जा रहा है, मालयात और ज़राये इब्लाग़ पर पूरा का पूरा क़ब्ज़ा कर लिया गया है, मज़हबी अक़ल्लियतों अदमे तहफ़्फ़ुज़ के एह़सास से परेशान व ख़ौफ़ ज़दा हैं। ऐसे ह़ालात में सैकुलिर्रज़म कैसे मज़बूत होगा? सह़ी मायनों में सैकुलिर्रज़म का जनाज़ा ही निकाल दिया गया है, कुर्सी के लिये बे-ज़मीर नेताओं ने पूरे मुल्क को ज़ात बिरादरियों में तक़सीम कर दिया है, मज़हबों के बीच नफ़रत का बाज़ार गर्म कर दिया गया है, ऐसे में क्या आज कोई कहे सकता है कि आज फेडेरल निज़ाम क़ायम है?
हिन्दुस्तान ने बरतानिया से 15 अगस्त 1947 ई0 को आज़ादी हासिल की थी, लेकिन हिन्दुस्तान का आईन जो सैकुलर्र बुनियादों पर बनाया गया था और उसको 26 जनवरी 1950 ई0 के दिन क़ायम किया गया था, ज़रूरत इस बात की है कि तमाम हु़क्मराँ जो किसी भी पार्टी के हों उनको इस आईने हिन्द की पासदारी करनी चाहिए, क्योंकि वह उसका हल्फ उठाते हैं, उसकी लाज रखें, सैकुलिर्रज़म का बुनियादी मक़सद यह है कि ज़मीर की, फिक्र की, मज़हबी और इज़हारे राय की पूरी आज़ादी हो, जो इन्सान का पैदाइशी हक़ है, लिहाज़ा हर शख़्स को पूरी आज़ादी होनी चाहिए कि सच्चाई का रास्ता ख़ुद तलाश करे और ज़िन्दगी के तमाम मसाइल, ख़्वाह उनका ताल्लुक़ सियासत और इक़्ितसादात से हो या मज़हब से, तभी सह़ी आज़ादी कहलायेगी, ताक़त के ज़ोर पर किसी का मुँह बन्द करना या धमकी या धोंस से किसी को अपना हम ख़्याल बनाना सैकुलिर्रज़म के खि़लाफ़ है।
यह मुल्क सिर्फ़ तुम्हारा नहीं, यह मुल्क हमारा भी हैः एक तुम ही नहीं तन्हा हक़दार इस गुलशन के, हक़ जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा है, यह मुल्क तुम्हारा नहीं यह मुल्क हमारा भी है। इस मुल्क की आज़ादी के लिये जान हमने भी गंवाई हैं, यह बहुत बड़ा अलमिया और सानिहा है कि आज हमारी नौजवान नस्ल बहुत कम जानती है कि जंगे आज़ादी में मुसलमानों और उलमा का कोई किरदार रहा है, जंगे आज़ादी का बिगुल उलमा-ए-किराम ने बजाया और अपनी जानों की कु़र्बानियाँ पेश कीं, ज़रूरत है कि नौजवानों को हिन्दुस्तान की आज़ादी के मौज़्ाूअ़ात पर किताबें बाँटीं जायें और पढ़ाई जायें।
हम सबको चाहिए कि मौजूदा ह़ालात से घबरायें नहीं, ह़ालात पर कड़ी नज़र रखें और हिकमत व ईमानी बसारत के साथ इत्तेह़ाद व इत्तेफ़ाक़ से मर्दाना वार मुक़ाबला करें, तालीम पर पूरी तवज्जोह मरकूज़ करें, मुसलमानों के तमाम मसाइल का हल सिर्फ़ तालीम में है, आर्टिकल 301 में कहा गया है कि हर अक़लियत चाहे, वह मज़हबी या लिसानी हो, उसे यह हक़ हासिल है कि वह अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ तालीमी इदारे क़ायम करे और चलाये, तालीम ही बे यारो मददगार मुस्लिम क़ौम के लिये नुस्ख़ा-ए-कीमिया है और उसकी ज़िम्मेदारियाँ क़ायेदीन और अहले इल्म पर हैं, मुल्क को सख़्तगीर अनासिर से बचाने के लिये सैकुलर्र इलैक्शन का ऐलान होते ही अनगिनत पार्टियाँ सामने आ जाती हैं और सबकी सब ग़रीबों व मुसलमानों की फ़लाह का दम भरती हैं, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं है, ऐसी पार्टियों और ज़मीर फ़रोश नेताओं को वोट बाँटने के लिये खड़ा किया जाता है, ताकि जो सख़्तगीर नज़रिया वाले हैं, उनका मक़सद पूरा हो जाये।
जम्हूरियत में वोटों की अहमियतः वोटर एक अहम मक़ाम रखता है और हर वोट की अहमियत मुसल्लम है, 1951 ई0 में नाफ़िज़ होने वाले क़ानून के मुताबिक़ हक़े राये दही से फ़ायदा हासिल करनी की उम्र 21 साल थी, जो बाद में 1988 ई0 में 18 साल कर दी गई, हर वह फ़र्द, जिसकी उम्र 18 साल हो जाये, उसको चाहिए कि वह ब-ह़ैसियत वोटर अपने नाम का इन्द्राज कराये और इन्तेख़ाबात में अपने हक़े राये दही का इस्तेमाल ज़रूर ज़रूर करे, हर एक वोट क़ीमती होता है।
1996 ई0 में सिर्फ़ 17 वोटों की अक्सरियत से गुजरात में वड़ौदा से लोक सभा के लिये एक नौजवान ने जीत हासिल की और इसी तरह 1989 ई0 में सिर्फ़ 9 वोटों से एक कंेडीडेट को आन्ध्रा प्रदेश में अंकापली से लोक सभा के लिये मुन्तखि़ब किया गया, दिल्ली में मशहूर फ़िल्मी अदाकार आनजहानी राजेश खन्ना से मशहूर बी.जे.पी लीडर लाल क्रिशन आडवाणी ने 52 वोटों से जीत हासिल की थी। पिछले दिनों महाराष्ट्रा के इलैक्शन में 9 मुस्लिम उम्मीदवार सिर्फ एक हज़ार या उससे कम फ़ासिले से हार गए और बी.जे.पी के 14 उम्मीदवार ने सिर्फ़ 4 फ़ीसद से ज़्यादा वोट मिलने पर जीत हासिल की, वोट करना जम्हूरी हक़ ही नहीं, दीनी फ़रीज़ा भी है। जम्हूरी हुकूमत में वोट न सिर्फ हमारा क़ानूनी हक़ है, बल्कि शरीअ़ते इस्लामिया की तरफ से हम पर अ़ाइद एक शरई और मिल्ली फ़रीज़ा भी है। हम तमाम लोगों को अपनी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की ज़रूरत है, ताकि हमारा प्यारा मुल्क हिन्दुस्तान सैकुलिर्रज़म पर क़ायम रहे, जो सबके लिये फ़ायदेमन्द है।
अल्लाह हम सबको अपनी ज़िम्मेदारी निभाने और समझने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये। (आमीन)
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