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मुस्लिम प्रतिनिधित्व को कुचलने के लिए बेक़रार: कन्हैया कुमार

मुस्लिम प्रतिनिधित्व को कुचलने के लिए बेक़रार: कन्हैया कुमार
तारिक अनवर चंपारणी
मौसम के रूख के साथ राजनीति का रूख भी बदलना शुरू हुआ है। जैसे-जैसे सर्दी से बसंत की तरफ बढ़ रहे है तापमान भी बढ़ता जा रहा है। सर्दी तो छंट चुकी है और गर्मी के मौसम मे क़दम रख चुके है। मौसम के साथ-साथ चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद राजनीति का तापमान भी बढ़ना शुरू हुआ है। टिकट एवं सीट बँटवारे को लेकर बैठक पर बैठक हो रहे है। गठबंधन को लेकर भी उधेड़-बुन शुरू है। सभी जाति-विशेष के नेता एवं मतदाता अपनी प्रतिनिधित्व को लेकर बेचैन है। छोटी-छोटी पार्टियां दांवा ठोककर मजबूती के साथ अपना प्रतिनिधित्व माँग रही है। लेकिन बिहार मे लगभग 20 प्रतिशत की आबादी वाले मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को समाप्त करने की लगातार कोशिश हो रही है।
सबसे मज़ेदार बात बेगूसराय को लेकर है। बेगूसराय लेनिनग्राद के नाम से मशहूर है। बेगूसराय क्षेत्र कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ समझा जाता है। लेकिन यह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं है। अभी भी उसी भ्रम को आधार मानकर कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय पर अपनी दावेदारी पेश करती है। आज भी महागठबंधन मे कम्यूनिस्ट पार्टी हिस्सेदार बनना चाहती है और बेगूसराय की सीट पर दावा ठोक रही है। जबकि बेगूसराय सीट मुसलमान समुदाय के हिस्से की सीट समझी जाती रही है। पूर्व मे भी जदयु से डॉ मोनजीर हसन सांसद निर्वाचित हुए है। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव मे राजद की टिकट पर पूर्व विधानपरिषद डॉ तनवीर हसन मोदी लहर मे भी मजबूत लड़ाई लड़े थे। अभी महागठबंधन होने की स्थिति मे कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट पर जेएनयू के पूर्व छात्रनेता कन्हैया कुमार की नज़र बेगुसराय सीट पर है।
अभी तक यह भ्रम फैलाया जाता रहा है की बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ रहा है और इसलिए ही बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जानते है। मैं जब कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूँ तब सामूहिक रूप से सभी कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूँ। लेकिन स्वतन्त्रता से लेकर आजतक केवल 1967 के लोकसभा चुनाव मे ही बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के योगेन्द्र शर्मा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे। जबकि 1962 के लोकसभा चुनाव मे मुस्लिम समुदाय से आने वाले अख़्तर हाशमी, 1971 के लोकसभा चुनाव मे योगेन्द्र शर्मा और 2009 के लोकसभा चुनाव मे शत्रुघ्न प्रसाद सिंह कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट से दूसरे स्थान पर रहे थे। 1977 के चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के इन्द्र्दीप सिंह 72096 मत, 1998 मे रमेन्द्र कुमार 144540, 1999 के चुनाव मे सीपीआई(एमएएल) के शिवसागर सिंह 9317 और 2014 के लोकसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र प्रसाद सिंह जदयु गठबंधन से 192639 मत प्राप्त करके तीसरे स्थान पर रहे थे। जब्कि 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 2004 के लोकसभा चुनावों मे कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय से अपना उम्मीदवार तक नहीं उतार सकी थी। फिर सवाल है की बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?
बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत चेरिया बरियारपुर, साहिबपुर कमाल, बेगूसराय, मठियानी, तेघरा, बखरी और बछवाड़ा विधानसभा का क्षेत्र आता है। चेरिया बरियारपुर से केवल एकबार 1980 के विधानसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सुखदेव महतो विधायक चुने गये थे। साहिबपुर कमाल विधानसभा क्षेत्र से अभी तक एक बार भी कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने मे सफल नहीं रही है। बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र से आज़ादी के बाद से अबतक केवल तीन बार ही कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने मे सफल रही है और आखिरी बार कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र सिंह 1995 का विधानसभा चुनाव जीते थे। मठियानी विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी तीन बार चुनाव जीतने मे सफल रही है लेकिन सन 2000 मे हुए विधानसभा चुनाव के बाद आजतक कम्यूनिस्ट पार्टी यहाँ से चुनाव नहीं जीत सकी है। तेघरा विधानसभा क्षेत्र मे कम्यूनिस्ट पार्टी लगातार 2010 से ही विधानसभा का चुनाव हार रही है। कम्यूनिस्ट पार्टी का पूर्ण रूप से दबदबा केवल दो विधानसभा क्षेत्रों क्रमशः बखरी और बछवाड़ा पर रहा है। लेकिन बखरी सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी आखिरी बार 2005 मे चुनाव जीतने मे सफल रही थी। जब्कि बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चार बार विधायक चुने गये है और आखिरी बार 2010 का विधानसभा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे। सबसे हास्यास्पद बात तो यह है की वर्तमान विधानसभा मे बिहार मे कम्यूनिस्ट पार्टी के मात्र तीन विधायक है और तीनों मे से एक भी बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से जीतकर नहीं आते है। यानि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव मे बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सात विधानसभा क्षेत्रों मे से एक भी क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीतने मे सफल नहीं रहे थे। प्रश्न फिर वही है की जिस लोकसभा क्षेत्र मे एक भी विधायक नहीं है वह कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?
2014 के लोकसभा चुनाव मे बेगूसराय से राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार डॉ तनवीर हसन को कुल 369892 मत प्राप्त हुए थे। जब्कि जदयु समर्थित कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह को 192639 मत प्राप्त हुआ था। वही 2009 के लोकसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के शत्रुघ्न प्रसाद सिंह को 164843 मत प्राप्त हुआ था। यदि कम्यूनिस्ट पार्टी द्वारा 2009 और 2014 मे प्राप्त किए गये कूल मतों को एकसाथ जोड़ भी देते है फिर भी डॉ तनवीर हसन साहब द्वारा 2014 के मोदी लहर मे प्राप्त किए गये मतों से भी कम है।
उपरोक्त आँकड़े यह बताने के लिए काफी है की बेगूसराय कभी भी कम्यूनिस्ट पार्टी का मजबूत क़िला नहीं रहा है। बल्कि पूर्वी चम्पारण(मोतीहारी), नालंदा, नवादा, मधुबनी, जहानाबाद इत्यादि ऐसे लोकसभा क्षेत्र है जहाँ से दो या दो बार से अधिक कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद निर्वाचित हुए है। जब्कि बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से मात्र एकबार ही कम्यूनिस्ट पार्टी को सफलता प्राप्त हो सकी है। लेकिन प्रश्न यह है की आख़िर कम्यूनिस्ट पार्टी क्यों बेगूसराय की सीट ही लेना चाहती है? जब कम्यूनिस्ट पार्टी सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व को लेकर इतना चिंतित रहती है तब फिर क्यों बेगूसराय मे मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को कुचलने का अथक प्रयास कर रही है?
एक तर्क है की कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता है इसलिए बेगूसराय की सीट कम्यूनिस्ट के खाते से कन्हैया को मिलनी चाहिये। यह बात सही है की कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता है और कम्यूनिस्ट विचारधारा के ऊर्जावान पथिक है। वह जब राष्ट्रीय स्तर के नेता है तब भारत के किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते थे। मोतीहारी, नवादा, नालंदा, मधुबनी, जहानाबाद तो कम्यूनिस्ट का गढ़ रहा है और पहले से भी पार्टी के सांसद निर्वाचित होते रहे है फिर बेगूसराय पर ही नज़र क्यों है? अरविंद केजरीवाल दिल्ली से चलकर प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध बनारस चुनाव लड़ने आये थे। दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद पश्चिमी उत्तरप्रदेश से चलकर मोदी के विरुद्ध बनारस लड़ने का एलान कर चुके है। हार्दिक पटेल ने भी कुछ ऐसा ही मंशा जाहीर किया है। फिर राष्ट्रीय स्तर के नेता कन्हैया कुमार मुसलमान समुदाय के हिस्से मे जाने वाली सीट से ही चुनावी मैदान मे उतरने के लिए क्यों उतावले है? क्या सिर्फ इसलिए की मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करके खुद की जीत सुनिश्चित कर सके? यानि की मुसलमानों के गर्दन पर चाकू चलाकर कन्हैया को सुरक्षित किया जा रहा है।
(लेखक़- तारिक अनवर चंपारणी, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्था (TISS), मुम्बई से मास्टर डिग्री है और वर्तमान मे बिहार के किसानों के साथ काम कर रहे है)
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