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73 वें जश्न.ए.आज़ादी पर विशेष : मुसलमां और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिंदुस्तान ?

73 वें जश्न.ए.आज़ादी पर विशेष : मुसलमां और हिन्दू की जान    कहाँ है मेरा हिंदुस्तान ?

अशरफ अस्थानवी
हमारी आज़ादी को आज 72 साल हो गए और आज देश अपना 73 वां जश्न मनरहा है। इस एक दिन को पाने के लिए हज़ारों प्राणों ने आत्माहूति दीए माँओं की गोद सूनी हुईए सुहागिनों की माँग का सिंदूर उजड़ा और बहने.अपने हाथों में राखी लिए हसरत से राह ताकती रह गईंए जिन कलाइयों में उन राखियों को बाँध जाना था। वह आजादी के लिए देश के काम आ चुकी थी। पन्द्रह अगस्त का दिन केवल एक दिन के संघर्ष का परिणाम नहीं है बल्कि यह वर्षों की तपस्याए तमन्ना और संघर्ष का परिणाम है।
अगर 1857 ईए को याद रखें तो यह अनुमान होगा कि इसके नब्बे वर्ष के बाद हमें यह दिन नसीब हुआ। स्वतंत्राता संग्राम में अनेक धर्म के लोग सम्मिलित रहेए अनेकता में एकता का सबूत देने के लिए यहाँ हर धर्म ए हर वर्गए हर समुदाय के लोगों ने तन.मन.धन सब कुछ दाँव पर लगा दिया था ।
देश की आज़ादी में उस दौर के इस्लामिक विद्वानों का बड़ा योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है।इतिहास साक्षी है कि अंग्रेजों ने 60 हज़ार उलेमा ;धर्म गुरु द्ध को बर्बरतापूर्ण ढंग से फाँसी पर लटका दिया और अनगिनत लोगों को कालापानी भेज दिया। आंडमान निकोबार में इनकी कब्रें देखी जा सकती हैं। आज के दिन हम उलेमा.ए.सादिकपुरए पटना के बलिदान पर जितना भी गर्व करें कम है। इन मामलों में बिहार का स्थान सर्वोपरि रहा है। हमारा प्रजातंत्र और ध्र्मनिरेक्षता की नींव यहीं की भूमि वैशाली में रखी गई थी। यह हमारे लिए गर्व का स्थान है।
देश के स्वतंत्राता संग्राम में जिस तरह मुस्लिम नौजवानोंए बूढ़ोंए बच्चों ने हिस्सा लिया उसी संघर्ष में हमारी भाषा उर्दू ने भी साथ दिया। इनकलाब ज़िंदाबाद का नारा लोगों में जोश भर देता था। यह नारा सिर्फ मुसलमानों का नारा नहीं था बल्कि इस नारे को हिंदुस्तान के सभी समुदाय के लोग आलाप रहे थे। इसी तरह सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैए देखना है जोर.ए.कितना बाज़ु.ए.क़ातिल में हैए इत्यादि स्वतंत्राता सेनानियों में जोश भर रहे थे। इसी तरह उर्दू समाचार.पत्रों ने भी बहुत सकारात्मिक भूमिका निभाई। जिसके लिए संपादकों को जेल की हवा तक खानी पड़ी। दिल्ली उर्दू अखबार के संपादक मोहम्मद बाक़र विश्व के पहले संपादक हैं जिन्हें 1857 ई॰ में बर्बर अंग्रेजी शासन के अत्याचार शोषण और अन्याय के विरुद्ध लिखने के जुर्म में पहले यातना देकर अध्मरा कर दिया गया बाद में सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में वृक्ष में लटकाकर फाँसी दे दी गई।
यह सब सिर्फ इसलिए था कि आजादी की लगन हर दिल में जगी हुई थी कोई दाँव.पेंच नहीं थाए एक को चोट लगती तो दूसरा उसका दर्द महसूस करता था। हिन्दू.मुस्लिम.सिख.ईसाई की कोई क़ैद नहीं थी। सब के सब आजादी के मतवाले थे। आपसी भाई.चारेए मेल मोहब्बत के साथ सभी इसे पाने को बेचैन थे।
हज़ारों लोगों की क़ुर्बानी के बाद हमें यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। लेकिन क्या हम आज उतने स्वतंत्रा हैं जितने सन् 1947 ई॰ में थेघ् क्या वह सदभावना का वातावरण आज भी हमारे देश में विद्यमान हैघ् इतने वर्षों में आखिर क्या हो गया कि आज हम अपने भाई को ही संदेह की दृष्टि से देखने लगेघ् इसी प्रकार पीर.फक़ीर.सुफयों और संतों का आगमन जिस मार्ग से होता था उसे शुभ माना जाता था। लोगों का समूह उनकी ओर अनायास खिंचा चला आता थाए आज अगर साधु .संत गेरूवस्त्रा धारण किए या दाढ़ी.टोपी वाले सूफ़ी गलियों से गुज़रने लगें तो लोग संदेह और अनिष्ठ की आशंका से उन्हें देखने लगते हैं और कानाफूसी आरंभ हो जाती है।
इतने वर्षों में आखिर ऐसा क्या होग गया कि हमने एक दूसरे का विश्वास खो दियाघ् इस पर चिंतन.मनन की आवश्यकता है। देश वहीए हम वहीए परिवेश वही फिर इतना परिवर्तन कैसे उत्पन्न हो गयाघ् हम आज अपने भाईयों के लिए संदेह और आशंका में आकंठ डूब गए हैं। ऐसे अवसर पर राष्ट्रकवि अल्लामा इक़बाल हमारा मार्गदर्शन करते हैं ..
शक्ति भी शाँति भी भक्तों के गीत में है। धरती के वासियों की मुक्ति प्रीत में है ।।
आज के दिन हमें समीक्षा करनी चाहिए कि हमसे कहाँ.कहाँ और कैसी चूक हुईघ् आपसी लड़ाई.झगड़ेए दंगा.फसादए मार.पीट से किसी का भला नहीं होने वाला है। आज के दिन हमें संकल्प लेने की आवश्यकता है कि धर्म .जाति.वर्ग.संप्रदाय.भाषा के मतभेदों को भुलाकर एकजुटता के बंध्न में बंध् जाएँ और कहें .. ष्ष्सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा ।।ष्ष् आवश्यकता इस बात की आन पड़ी है कि लोगों के मन से मैल हटाई जाएए लोगों में सदभाव और विश्वास के दीप प्रज्वलित किए जाएँ और ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाए कि पूरा देश प्रेम.मुहब्बत.भाईचारा के बंध्न में पिफर से बंध जाए।
ष्ष्हर सुबह उठ के गाएँए मंतर वो मीठे.मीठेए सारे पुजारियों को मय प्रीत की पिला दें।ष्ष्
आज़ादी के समय के भारत के संबंध में एक बात याद आ रही है। यह घटना 1985 ई॰ की हैए मैं स्नातक का विद्यार्थी थाण् पटना के प्रसिद्ध भारतीय नृत्य कला मंदिर के खुले मंच में अखिल भारतीय मोशायराए एण्जीण् बिहार के तत्वावधन में आयोजित किया गया थाण् भारत के नामचीन शायर इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। प्रसिद्ध शायर अजमल सुल्लानपुरी भी सम्मिलित हुए थे। उन्होंने इस अवसर पर देशभक्ति से ओत.प्रोत ऐसी लंबी सुललित कंठ में कविता का पाठ किया कि सारे प्रेक्षकवृंद मंत्रामुग्ध् हो गए थेण् उन्होंने अखंड भारत का चित्र और भारतीय गंगा.यमुनी संस्कृति का जो चित्रांकन किया थाए वह आज भी मेरे स्मृति पटल पर विद्यमान है। उनकी कविता मुझे आज याद आ रही हैए वह कालजयी कृति स्वतंत्राता के शुभ अवसर पर मैं आपके साथ उस स्मृति को साझा करने के मोह को नहीं छोड़ पा रहा हूँ।
मुसलमाँ और हिंदू की जानए कहाँ है मेरा हिंदुस्तान घ्
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
मेरे बचपन का हिंदुस्तानए न बंगलादेश न पाकिस्तान
मेरी उम्मीद मेरा अरमानए वोह पूरा.पूरा हिंदुस्तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
अनोखा और निराला देशए वह बचपन का मधुशाला देश
वह मंदिर मस्जिद वाला देशए जहाँ है गीता और कुरआन
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
जहाँ के कृष्ण. जहाँ के रामए जहाँ की शामए सलोनी शाम
जहाँ की सुब्ह बनारस धाम ए जहाँ भगवान करें स्नान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
ये है मौजूदा हिंदुस्तानए लड़ाई झगड़े का मैदान
क़ाश मिल जाए कोई इन्सानए जिसे हो मानवता का ज्ञान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
वो मेरे पुर्खों की ज़ागीर दृ कराची लाहौर और कश्मीर
वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर दृ वो पूरा पूरा हिन्दुस्तान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ दृ मैं उसको ढूंड रहा हूँ
मुझे है वह लीडर तस्लीमए जो दे यकजहती की तालीम
मिटाकर कुंबों की तक़्सीमए जो कर दे यक क़ालिब दो जान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।
और यही हर देशभक्त भारतीय के हृदय की पुकार है। जैसे पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी ने बर्लिन की दीवार को तोड़ कर एक जर्मन राष्ट्र कर दिया क्या वह सपना यहाँ पूरा नहीं हो सकता घ् हमें वही हिंदुस्तान चाहिए और यही स्वतंत्राता दिवस का संदेश होना चाहिए ।
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;लेखक स्टार न्यूज़ टुडे के विशिष्ट संपादक हैंए संपर्क रू 9431221357ए8210526334ए 0612.2302682
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