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क्यों हमारा कोई रहनुमा नहीं होता। होता है तो बस पत्थर होता है।

शादियों का मौसम है। फागुन की हवा है। लेकिन गांव मे सन्नाटा पसरा हुआ है। उधार के डैम पर बेटियों के हाथ पीले कर रहे है किसान। बाकि का बस अंदाज़ा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मालूम है। किसानो के खेतों मे से गन्ना कट कर मिलों और कोल्हुओं मई जा चुका है। गन्न से चीनी बन कर शहर के कप मई घुल चुकी है। चीनी का पैसा मिल मालिकों की जेब मई जा चूका है। शीरे से शराब बन चुकी है, शराब के जाम महफ़िलो मई उत् चुके है।और शीरे का पैसा भी मिल मालिकों की जेब मे जा चूका है। लेकिन गन्न का पैसा कहा गया। किसान पर्ची पर लिखी क़ीमत को देख कर आस लगाये खड़ा है। मिल मालिकों के रहमो करम पर करोड़ो लोग अपना दांव खेले हुए है। लेकिन कोई रहम नहीं मिल रहा है। हज़ारों करोड़ के गन्न का पेमेंट दबाये बैठे है मिल मालिक। उप की एक भी मिल ने पूरा पेमेंट नहीं किया किसानो का। उधार का बयाज़ और भी क़मर तोड़ रहा है लेकिन कोई आंदोलन नहीं, कही से कोई आवाज़ नहीं। सोशल मीडिया मई भी सिरे से गायब यह किसानो का दर्द कैंसर बन चूका है। नेता कहा गये। कोई मालूम नहीं है। हर बार सरकार बदलती है तो बदलती है उम्मीद। इस बार सरकार समाजवादी है लिहाज़ा मिल मालिक समाजवादी है। लेकिन क्या कारन है कि इनके कानो पर कोई जू नहीं रेंग रही है। कारण सबको मालूम है किसान का दर्द एक है लेकिन जाति नहीं। जात तय करती है दर्द मे मुस्कुराने के क़ायदे। इस बार कोई और जाति कबीलों के गठबंधन के दम पर सरकार बना रही है कल कोई और बना लेंगी।
और मैं कहा खड़ा हूँ।कई बार गुनाह खुद पीछा करते हैं गुनाहगारो का। बचपन मई कही पढ़ा था। पता नहीं कितना सच है। लेकिन मै खुद को गुनाहगार पाता हु और गुनाह छोड़ भी नहीं सकता। मैं किसानों के बच्चों मे शामिल हूँ। घर से निकला था की आवाज़ कही तो पहुचाऊँगा। लेकिन आवाज़ ही बेच दी। लगता है की जो आवाज़ अब गले से निकलती है वो आवाज़ मेरी नहीं है। इतने दिनों मे किसान ही ज़िन्दगी के फ़लक से गायब हो गया। पिताजी गांव से 20 किलोमीटर दूर आये। और मैं 100 किलोमीटर आ गया। पिताजी की ज़िंदगी मई जितना शामिल था गाओं मेरे मे उससे कम हो गया। Dhirendra Pundir-Reporter (News Nation)